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नास्तिकजी का आस्तिकतावादी आडम्बर- एक आतंकवादी दर्शन भाग 3

Posted On: 29 Aug, 2012 Others में

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नास्तिकजी का आस्तिकतावादी आडम्बर- एक आतंकवादी दर्शन भाग 3
नास्तिकजी- श्री आस्तिक जी, मरीज एक ही बीमारी के इलाज़ के लिए अनेक अस्पतालों में चक्कर क्यों लगाता है ?
आस्तिक जी- भाई जी , हो सकता है वहां पर कोई अच्छा पढ़ा लिखा तथा ज्यादा होशियार एवं अनुभवी डाक्टर होगा. तथा वह रोग का इलाज सही एवं पूर्ण रूप से कर देगा.
नास्तिक जी- तो क्या शेष सपतालो में अनाडी, कम अनुभवी, कम पढ़े लिखे एवं ढोंगी डाक्टर होते है? इसका मतलब तो यह हुआ क़ि सरकार जबरदस्ती ऐसे अयोग्य डाक्टरों के द्वारा लोगो को इलाज कराने पर मज़बूर करती है. यदि इन अस्पतालों में योग्य एवं अनुभवी डाक्टरों की ही भरमार है. तो फिर सरकार इन्हें क्यों नियुक्त कर राखी है? क्या यह जनता के साथ धोखा एवं उनके जीवन के साथ खिलवाड़ नहीं है?
आस्तिक जी- नहीं, यह बात नहीं है. किसी अस्पताल में किसी एक रोग का विशेषग्य होता है. तथा दूसरे अस्पताल में दूसरे रोग का विशेषज्ञ होता है. क्या आप ने नहीं सुनाया है क़ि कैंसर अस्पताल, टीबी अस्पताल आदि.
नास्तिक जी- तो क्या एक अस्पताल में किसी रोगी को कैंसर होता है वह दूसरे अस्पताल में एड्स का मरीज बन जाता है?
आस्तिक जी- मै आप का मतलब नहीं समझा.
नास्तिक जी- जो रोगी एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में जाएगा वह वहां पर भी उसी रोग के इलाज के लिए जाएगा जिस रोग के इलाज के लिए वह पहले अस्पताल में गया होगा. अगर कोई आँख का रोगी होगा तो वह कही पर भी आँख के डाक्टर से ही अपना रोग दिखाएगा. चाहे कितना भी बड़े अस्पताल में क्यों न जाय. तो मेरे कहने का मतलब है क़ि एक अस्पताल में यदि अनाडी आँख का डाक्टर है जो इलाज ठीक नहीं कर सकता. तथा दूसरे अस्पताल में आँख का डाक्टर ठीक इलाज कर सकता है. तो फिर उस अनाडी डाक्टर एवं उस अस्पताल को सरकार क्यों चलने देती है या मान्यता दे राखी है?
आस्तिक जी- हो सकता है उस अस्पताल में सारे उपकरण उपलब्ध न हो. इसलिए मरीज को दूसरे अस्पताल में जाना पड़ता है.
नास्तिक जी- फिर बिना आवश्यक उपकरण एवं संसाधनों के सरकार ऐसे अस्पतालों को क्यों मान्यता दे राखी है?
आस्तिकजी- ऐसे अस्पतालों में ज्यादा खर्च बढ़ जाता है जहाँ पर ये सारे संसाधन उपलब्ध होते है. और ऐसी अवस्था में सामान्य आदमी इलाज नहीं करा पायेगा. फिर गरीबो का क्या होगा?
नास्तिकजी – अर्थात गरीबो का इलाज बिना इन संसाधनों के भी संपन्न कराया जा सकता है? तो क्या धनी लोग इलाज कराने नहीं बल्कि उन संसाधनों का उपभोग या दूसरे शब्दों में विलास करने इन अस्पतालों में जाते है क्या? लेकिन आस्तिकजी, मरीज एक नहीं बल्कि ऐसे अनेक अस्पतालों का चक्कर लगाते है. तो क्या जिन अस्पतालों में उनका रोग ठीक नहीं होता वे अस्पताल उन मरीजो से ली गयी धन राशि एवं दवा की रकम उन मरीजो को वापस कर देते है?
आस्तिक जी – ऐसा कैसे होगा? जो दवा आदि में खर्च हो गया वह कहाँ से वापस होगा?
नास्तिकजी- दवा आदि में खर्च ही क्यों कराया गया? जब रोग उनसे या उस अस्पताल में ठीक ही नहीं होना था तो मरीज का पैसा क्यों खर्च कराया गया? यह तो ज्योतिषियों एवं पाखंडियो की तरह लूट एवं धोखा है. समाज का कलंक एवं हिन्दुओ के धर्म ग्रंथो की तरह एक तरह से लोगो का शोषण है. कोई बात नहीं आस्तिक जी नमस्कार.
पाठक

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