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नास्तिक जी का आस्तिकतावादी आडम्बर- एक आतंकवादी दर्शन भाग 5

Posted On: 30 Aug, 2012 Others में

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नास्तिक जी का आस्तिकतावादी आडम्बर- एक आतंकवादी दर्शन भाग 5
नास्तिकजी- आस्तिकजी, कृपया यह बताएं, समाज में रिस्तो का क्या महत्त्व है? इनकी क्या आवश्यकता है?

आस्तिकजी- समाज में एक दूसरे के प्रति प्रेम का सम्बन्ध बनाने, स्थायित्व लाने एवं एक दूसरे को एक सूत्र में बांधने के लिये रिश्ते ही एक मात्र प्रबल, उचित एवं ठोस उपाय है.

नास्तिकजी- नहीं, मेरा मतलब यह है कि ये इतने रिस्तो क़ी क्या आवश्यकता है? भाई, बहन, मा, बाप, चाचा, मौसी, मामा आदि? क्या किसी एक रिश्ते से प्रेम का रिश्ता नहीं बन सकता है?

आस्तिकजी- आस्तिकजी, रिश्ते स्थिति, समूह एवं देश-काल के अनुसार बनते है. जैसे जो किसी बच्चे को जन्म देती है वह महिला उस बच्चे क़ी मा होती है. उसी महिला से जन्म लेने वाली बच्ची उस महिला से जन्म प्राप्त बच्चे क़ी बहन होती है. इस प्रकार दूसरी महिला से जन्म प्राप्त बच्ची एवं अपनी मा से जन्म प्राप्त बच्ची दोनों में बहनत्व प्रेम में अंतर होता है. जो अपनी मा से जन्म प्राप्त बच्ची होती है उससे बहनत्व का अंश ज्यादा होता है.

नास्तिकजी- तों फिर जब दूसरी महिला से जन्म प्राप्त बच्ची से बहनत्व कम होता है तों उसे बहन का दर्ज़ा देना ही नहीं चाहिए. केवल अपनी मा के पेट से ही जन्मी बच्ची को बहन का दर्ज़ा देना चाहिए. जहाँ पर प्रेम में या विश्वास में या सम्बन्ध में कमी हो उसे क्यों कर बनाए रखना? जब कि उससे ज्यादा प्रेम, विश्वास या सम्बन्ध प्रगाढ़ता वाला रिश्ता मौजूद है?

आस्तिकजी- आप कौन सा रिस्ता इन बच्चियों से बनाने क़ी राय दे रहे है?

नास्तिकजी- क्यों न इन बच्चे-बच्चियों में पति-पत्नी का रिश्ता स्थापित किया जाय?

आस्तिकजी- यह कैसे हो सकता है? इतने सारे बच्चे एवं बच्चियों के मध्य पति-पत्नी का रिश्ता कैसे संभव है?पति-पत्नी तों कोई एक ही बच्चा एवं बच्ची के बीच स्थापित हो सकता है.

नास्तिकजी- ऐसा क्यों? पत्निया तों बहुतेरी हो सकती है. आज के परिवेश में पति भी अनेक हो सकते है. पति का मतलब क्या होता है?

आस्तिकजी- पति के साथ एक पवित्र, संयमित, अनुशासित एवं मर्यादित सम्बन्ध होता है. तथा इस प्रकार उनसे एक शुद्ध संतान उत्पन्न होती है. पति एवं पत्नी से एक नए संसार एवं परिवार या दुनिया का अवतार होता है.

नास्तिकजी- पति तों कोई व्यक्ति विवाह के बाद बनता है. फिर वह विवाह होते ही पवित्र एवं संयमित आदि कब, कैसे, और क्यों बन जाता है? यह कहाँ लिखा है या कौन सी भौतिक या रासायनिक प्रक्रिया है जिसके मिश्रण के परिणाम स्वरुप कोई व्यक्ति विवाह होते ही पवित्र एवं संयमित आदि बन जाता है? और यदि ऐसा है तों फिर जल्दी जल्दी लडके लड़कियों क़ी शादी क्यों नहीं करा दी जाती है? ताकि सब लडके संयमित एवं पवित्र बन जाय. यदि मान लेता हूँ कि विवाह क़ी भी एक उम्र निर्धारित है. तों फिर सारे विवाह एक ही उम्र में क्यों नहीं करा दिये जाते है? क्यों किसी कि शादी 21  वर्ष में तथा किसी क़ी शादी 31 वर्ष में करने क़ी अनुमति दी जाती है? क्यों निर्धारित समय के बाद इतने दिनों तक लड़को को असंयमित एवं अपवित्र रखा जाता है?  इसके अलावा क्या पति के अलावा सभी लडके असंयमित एवं अपवित्र होते है? ऐसा कौन सा जादू पति बनते ही लडके में आ जाता है जो बिना पति बने लडके में नहीं आ सकता? या ऐसा कौन सा काम है जो बिना पति बने लड़का नहीं कर सकता? क्या बिना शादी किये लड़का शारीरिक सम्बन्ध बनाने में अक्षम होता है? क्या बिना शादी किये लडके में संतान उत्पन्न करने क़ी क्षमता नहीं होती है?

आस्तिकजी- नास्तिकजी ऐसी बात नहीं है.

नास्तिकजी- तों फिर कौन सी बात है? क्यों नहीं कोई लड़का अपनी बहन से शारीरिक सम्बन्ध बना सकता है? बीबी बनने वाली लड़की के पास ऐसा कौन सा अँग अधिक जोड़ दिया जाता है जिसके कारण वह पत्नी बन सकती है लेकिन बहन पत्नी नहीं बन सकती है? क्या बहन संतान उत्पन्न करने में अक्षम हो जाती है?

आस्तिकजी- नास्तिक जी कुछ सामाजिक मान मर्यादा भी होती है.

नास्तिकजी- फिर आप वही हिन्दुओ के ढपोल ज्योतिष क़ी तरह भ्रम फैलाने वाली बातें करने लगे. आखिर समाज क़ी रचना किसने क़ी है? व्यक्ति के द्वारा ही तों समाज क़ी रचना हुई है? उसी ने विविध मर्यादाओं को जन्म दिया है. फिर ऐसी मर्यादा को तोड़ देने से कौन सी आपदा आ जायेगी?

आस्तिकजी- फिर तों मा, बहन भाई आदि का रिश्ता ही कुछ नहीं रह जाएगा?

नास्तिकजी-बात रिश्ते के समाप्त होने क़ी नहीं. बल्कि इससे सिवाय प्रतिबंधो के और क्या चीज समाज को मिलता है? यदि बहन सुन्दर हो, मा जवान हो या मौसी पर दिल आ जाय तों उससे शारीरिक सम्बन्ध बनाने को हिन्दुओ ने किस आधार पर और किस तकनीकी कारण से प्रतिबंधित किया है? शादी के बाद जो प्रेम पत्नी से हो जाता है, वह मा-बहन से बिना शादी किये क्यों नहीं हो सकता है? ये सारे रीति रिवाज निराधार एवं निरर्थक रूप से समाज पर थोपे ही तों गये है? इसके सिवाय इनका और क्या व्यावहारिक औचित्य है?
आस्तिकजी- फिर तों किसी का किसी से कोई सम्बन्ध ही नहीं रह जाएगा.
नास्तिकजी- बिल्कुल रहेगा. बल्कि कोई भेद ही नहीं रह जाएगा. सब अमां होगें. सब मा ही होगी. सब बहने ही होगी. सब बुआ, मौसी एवं ताई होगीं. सब को सब समान दृष्टि से देखेगें. कोई पत्नी नहीं, कोई बहन नहीं, कोई मा नहीं. सब क़ी सब पत्नीयां ही होगी. फिर किसी से प्रेम करने में कोई भेद या प्रतिबन्ध नहीं होगा. कोई झिझक नहीं होगी. शर्म या इज्ज़त-बेईज्ज़त के झंझट से सब मुक्त होगें. जब जो जहाँ चाहे जिससे चाहे उन्मुक्त रूप से यौन सुख के स्वाद को चखता रहेगा. क्या ही सुन्दर, शान्ति से भरपूर, अति सुखकारी समाज होगा?
आस्तिकजी- धन्य हो नास्तिक जी.
नास्तिकजी- न कोई कुंडली होगी. न कोई ग्रह होगा. न कोई मंगल दोष होगा. न ही मांगलिक ढूँढने क़ी झंझट होगी. न कोई पूजा-पाठ आवश्यक होगा. न किसी से किसी का कोई बैर होगा. सब एक दूसरे के संबंधी होगें. एक अति सुन्दर संतुलित समाज होगा.
आस्तिकजी- आप तों जिस व्यवस्था का उल्लेख कर रहे है वह आदिम युग या प्राचीन पाषाण कालीन समाज का स्वरुप है.
नास्तिकजी- आप बिल्कुल ठीक समझे. किन्तु क्या आप ने उस काल को देखा था? तों जिस काल, देश, व्यक्ति, समाज आदि को देखा नहीं उसे आप किस आधार पर सही मान सकते है? आप फिर वही हिन्दुओ के पाखण्ड पूर्ण मान्यताओं एवं सिद्धांतो का रोना ले बैठे. ऐसे तों समाज जैसे का तैसे ही रह जाएगा. इसीलिए हिन्दू समाज में विविध बुराईयाँ फ़ैल रही है. क्या हुआ जो प्राचीन पाषाण कालीन सभ्यता का पुनः उदय होता है तों? किसी को वस्त्र क़ी चिंता नहीं रह जायेगी. सब नंगे रहेगें. कपड़ा खरीदने एवं उनकी सिलाई से निजात मिल जाएगा. रुपये पैसे क़ी भी बचत होगी. शादी विवाह क़ी समस्या समाप्त हो जायेगी. कोई किसी से कही भी शादी कर लेगा. विवाह में होने वाला अनावश्यक खर्च भी बच जाएगा. किसी का कोई घर नहीं होगा. अर्थात सबका घर सबके लिये होगा. कोई वैमनस्यता नहीं होगी. कोई पक्षपात नहीं होगा. सबको यह भाई है, यह बहन है, यह मा है, यह सब सोचने से मुक्ति मिल जायेगी. यह सब फालतू बातें सोचने क़ी ज़रुरत किसी को नहीं होगी. कोई किसी का बच्चा नहीं होगा. अर्थात सब बच्चे सब के होगें. किसी को अपनी हबस क़ी भूख मिटाने के लिये ज्यादा भाग दौड़ करने क़ी ज़रुरत नहीं होगी. मा, बहन या मौसी जो कोई भी होगी बस तत्काल उसकी यह बुभुक्षा भी शांत हो जायेगी. और फिर उसे ज्यादा देर तक छटपटाना नहीं पडेगा. न कोई डर होगा न कोई भय. बिल्कुल भय मुक्त निश्छल समाज क़ी स्थापना होगी.
आस्तिकजी- फिर तों समाज क़ी कोई ज़रुरत ही नहीं होगी.
नास्तिकजी- आप बिल्कुल ठीक समझे. कोई समाज नहीं होगा. क्योकि समाज बनते ही नाना प्रतिबन्ध स्वतः ही जन्म ले लेते है. क्योकि समाज का जन्म ही किन्ही सिद्धांतो एवं मान्यताओं के आधार पर होता है. और जब सिद्धांत, मान्यता या शर्त आते है समाज में बुराईयाँ फ़ैलने लगती है. लोगो के काम करने क़ी गति धीमी पड़ जाती है. कोई भी काम करने के पहले बहुत कुछ सोचना पड़ जाता है. जैसे आज हिन्दू समाज में इतनी मान्यताएं एवं प्रतिबन्ध हो गये है कि जितने समाज में सदस्य नहीं उतने समाज सुधारक होने के बावजूद भी सामाजिक उत्थान नहीं हो पा रहा है. या समाज उत्थान क़ी गाडी गति नहीं पकड़ रही है. चलिए अब फिर समय से वार्ता होगी. नमस्कार.
पाठक

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