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औरतो के अपराधी चौदहवीं सदी के तुलसी या इक्कीसवीं सदी के?

Posted On: 10 Sep, 2012 Others में

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औरतो के अपराधी चौदहवीं सदी के तुलसी या इक्कीसवीं सदी के?
एक बनिया के घर में एक चूहा सपरिवार रहता था. बड़े मजे में वह बनिया के दूकान की खाने वाली चीजों का सपरिवार भोग लगाता था. बनिया तो वैसे हल्दी का थोक व्यापारी था. वह और कोई चीज नहीं बेचता था. किन्तु वह अपने लिए घर से खाने पीने की चीजें लेकर रोज दूकान पर आता था. तथा दोपहर का भोजन एवं नास्ता आदि वह दूकान में ही करता था. खा पीकर वह बर्तन इकट्ठा कर के रख देता था. तथा घर जाकर बर्तन धोता था. चूहे उसका जूठन खाना भी खाते थे.  तथा उसके कुरते, पाकिट में रखे रुपये पैसे आदि को भी कुतर देते थे. नित्य स्वादिष्ट खाना प्रचुर मात्रा में मिलने के कारण धीरे धीरे उसके परिवार के सदस्यों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती चली गयी. अब बनिया की दूकान के सामान ज्यादा नुकसान होने लगे. बनिया को चिंता हुई. उसने एक चूहादानी मंगवाया. और धीरे धीरे एक एक कर उस चूहे के परिवार के सदस्यों को बाहर दूर फेंकवा दिया. खुले में पडा चूहा परिवार कुछ तो चील कौवो का शिकार बन गया. शेष किसी तरह जान बचाकर किसी सुरक्षित जगह पर शरण ले लिए. और कुछ दिन बाद बचे परिवार के वे सदस्य वापस उसी दूकान में पहुंचे. फिर सब ने मिल कर परस्पर राय मशविरा किया. सब ने एक सुर से बनिया के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव पारित किया. और बनिया के इस अपराध के लिए भयंकर दंड की व्यवस्था करने के प्रस्ताव के साथ उनकी वह सभा समाप्त हुई. अब सभी ने मिलकर उसके गल्ले में छेद करने की योजना बनायी. सब ने मिल कर जोर शोर से काम करना शुरू किया. और रात रात में ही गल्ले में छेद कर के उसके पैसो को ढूँढने लगे. लेकिन बनिया तो दूकान बंद करने के साथ ही गल्ला निकाल कर उसे साथ लेकर चला गया था. उनके हाथ में कुछ एक ही रुपये लगे. उसी रुपये को सब ने मिल कर बुरी तरह कुतर दिया. फिर गुस्से में सब बाहर निकल कर उसके फर्श धोने के लिए रखे गए तेज़ाब के डिब्बे को भी कुतर दिया. तेज़ाब के डिब्बे में छेद होते ही वह उग्र तेज़ाब द्रुत गति से बहते हुए बाहर निकला. और चूहों के ऊपर पडा. ढेर सारे चूहे जल गए. किन्तु परिवार का मुखिया बच गया. अब उसे भय हो गया. वह उस दूकान से भाग निकला. अफसोस एवं चिंता में वह इधर उधर भटक रहा था. तभी रास्ते में उसे एक हल्दी की गाँठ मिल गयी. उसने सोचा क़ि बनिया के पास भी तो हल्दी था. उसी से बनिया भी दूकान चलाता था. और बड़े स्वादिष्ट भोजन नित्य ही करता था. हम भी इस हल्दी की गाँठ से दूकान करेगें. और जब दूकान खूब चल जायेगी. तो सपरिवार अच्छे एवं स्वादिष्ट भोजन करेगें.
बस क्या था? उसने भी दूकान खोल दी. अपने समाज में नयी दूकान एवं उसमें भी नयी चीज देख कर सबने उसे तुरत खरीद लिया. और उसे सहेजने की चीज समझ कर सबने उसे अपने अपने घरो में रख लिया. अब चूहे को फिर दुबारा हल्दी लाने की चिंता सताने लगी. बहुत विचार के बाद वह पुनः रात को उस बनिया की दूकान में पहुंचा. और पूरा एक गट्ठर ही घसीट कर लाने का प्रयत्न करने लगा. उस गट्ठर के ऊपर ही उसके तौलने के बाट रखे हुए थे. बस, उस गट्ठर के ऊपर से वह लोहे का भारी बाट उस चूहे के सिर पर गिर गया. चूहे का सिर कुचल गया. और वह मर गया.
इसी तरह आज के तुलसी दास लोग है. राम चरित मानस में एक चौपाई पढ़ लिए-
शूद्र गंवार ढोल पशु नारी. सकल ताड़ना के अधिकारी.
अर्थात शूद्र जिसका शुद्ध रूप क्षुद्र है, गंवार अर्थात बुद्धि हीन, ढोल अर्थात वाद्य यंत्र जो पीटने पर बजता है, पशु अर्थात जंगली प्राणी (पालतू नहीं), नारी अर्थात औरत. ये सब प्रताडनीय है.
बस इतना तुलसी दास ने औरतो के बारे में क्यों कहा? वह औरत विरोधी है. औरतो के प्रति उनके पास कोई सम्मान नहीं है. उन्होंने औरतो के सम्मान पर कुठारा घात किया है. वह अनपढ़, गंवार, जाहिल एवं सामाज विरोधी थे. उनका बहिष्कार होना चाहिए. उनके इस ग्रन्थ को पर्तिबंधित कर देना चाहिए. आदि आदि. मध्य प्रदेश में हुए किन्नरों की सभा की भांति इन्होने भी अपना एक समाज – एक संगठन तैयार कर लिया. औरतो के लिए उनके सम्मान में टेसुए बहाने लगे. औरतो को यह समझाने में लग गए क़ि तुलसी ने ही औरतो को इस गिरी हुई दशा में पहुंचाया.
किन्तु शायद इन चूहों को इतना ज्ञान नहीं है क़ि अब औरतें पढ़ लिख गयी है. उन्होंने भी राम चरित मानस पढ़ा है. अंतर सिर्फ इतना है क़ि ये औरतें पूरा राम चरित मानस पढी है. और ये टेसुए बहाने वाले इस पवित्र ग्रन्थ के ज्ञान की ढेरी से एक हल्दी का वह टुकड़ा उठा लिए जो उनकी मौत का कारण बनने वाला है.  देखें-
सती जी ने श्रीराम की पत्नी सीता का रूप धारण किया था. अपनी पत्नी के रूप में होते हुए भी भगवान राम सती को शीश झुका कर विनम्रता पूर्वक प्रणाम करते है-
“जोरी पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू. पिता समेत लीन्ह निज नामू.” ——(बालकाण्ड- सती मोह)
सूर्पणखा ने राम को अपनी वासना का शिकार बनाना चाहा-
रुचिर रूप धरी प्रभु पहि जाई. बोली बचन बहुत मुसुकाई.
तो  सम पुरुष न मो सम नारी. यह संयोग विधि रचा विचारी.
——————————–अहई कुमार मोर लघु भ्राता.
और भगवान ने उसके प्रणय निवेदन को बहुत शालीनता के साथ यह कह कर टाल दिया क़ि मैं पहले से ही विवाहित हूँ. मेरा छोटा भाई अविवाहित है. उससे पूछो, यदि उसकी सम्मति हो. तो उससे विवाह कर सकती हो. अर्थात एक अविवाहित स्त्री की मर्यादा विवाह के परिप्रेक्ष्य में महत्तम होती है. जो भोग्या नहीं बल्कि ग्राह्या है.
“अनुज वधु भगिनी सुत नारी. सुनु शठ कन्या सम ए चारी.
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकहि जोई. ताहि बधे कछु पाप न होई.” (किष्किन्धा काण्ड- बाली-सुग्रीव द्वंद्व युद्ध)
अर्थात भाई की पत्नी, बहन, पुत्र वधु एवं कन्या ये चारो बराबर है. इन्हें जो कुदृष्टि से भी देखे उसे वध कर देने में कोई पाप नहीं होता है.
यही नहीं स्त्री की सीख बहुत ही महत्व पूर्ण होती है-
“अहो मूढ़! अतिशय अभिमाना. नारि सिखावन करसि न काना.” (तदेव)
अर्थात हे मूर्ख! तुमने अति महत्त्व पूर्ण नारि की शिक्षा पर भी ध्यान नहीं दिया?
यदि तुलसी दास द्वारा महिलाओं की उच्चता का जितना वर्णन किया गया है, उसका उल्लेख उसी तरह दोहा-चौपाई में किया जाय तो एक नया रामचरित मानस तैयार हो जाएगा. फिर भी आप देखें- विश्वामित्र के यज्ञ विध्वंश में ताड़का के वध को भगवान ने यह कह कर अस्वीकार कर दिया क़ि उनके कुल में या शिक्षा में औरतो का वध निषेध है, यद्यपि वे भले कुलक्षनी हो. किन्तु जब विश्वामित्र ने कहा क़ि एक कुलक्षनी के नाश से यदि सैकड़ो सुलक्षनियो की रक्षा हो सकती हो, तो उसे करना चाहिए. तथा एक राजा को अपनी प्रजा के सुख के लिए किसी कुलक्षनी की ह्त्या आवश्यक है. अन्यथा प्रजा की पीड़ा से उस राजा को नरक यातना भोगनी पड़ती है. तब जाकर भगवान ने उस ताड़का का वध किया.
रावण के द्वारा सीता हरण के समय सीता जी चलाती जाती थी. तथा अपने आभूशानो को तोड़ तोड़ कर नीचे फेंकती जाती थी. जब राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ उन्हें ढूँढने निकले तो एक एक कर के वे आभूषण मिलते गए. राम प्रतेक आभूषण को उठा कर उसके बारे में लक्ष्मण से पूछते जाते थे. जैसे सिर का मंगल सूत्र मिला. राम ने उसे लक्ष्मण को दिखाते हुए पूछा क़ि लक्ष्मण देखो यह सीता का मंगल सूत्र है. तब लक्ष्मण जी का उत्तर था क़ि हो सकता है, यह सीता जी का हो. आगे फिर गले का हार मिला. फिर राम ने लक्ष्मण से कहा क़ि लक्ष्मण देखो यह सीता जी का हार है. लक्ष्मण जी ने उत्तर दिया क़ि हो सकता है यह सीता जे का हो. फिर उनका पाँव का पाजेब मिला. राम ने कहा क़ि देखो लक्ष्मण यह सीता का पाजेब लगता है. लक्ष्मण जी बिलकुल आवेशित हो गए. तथा बोले क़ि निश्चित रूप से यह माता सीता का ही पाजेब है. राम जी चौंक गए. उन्होंने पूछा क़ि मंगल सूत्र एवं हार के बारे में तुमने कहा क़ि हो सकता है क़ि सीता का हो. किन्तु जब पाजेब की बारी आई तब तुमने दृढ़ता पूर्वक कह दिया क़ि यह निश्चित रूप से सीता का ही है. ऐसा क्यों? लक्ष्मण ने उत्तर दिया क़ि सीता उनकी मान है. उन्होंने सीता को कभी सिर के ऊपर देखा ही नाहे. उन्होंने सदा उनके चरणों की तरफ ही देखा है. नित्य चरणों पर दृष्टि रहने के कारण उनके पाजेब की मुझे सही पहचान है.
इससे बड़ा एक औरत का सम्मान क्या हो सकता है?
यदि औरत जाति के प्रति दुर्भावना होती तो रावण जैसा त्रिलोक विजयी सीता को अशोक वन में क्यों रखता? उन्हें अपने सोने के महलों में बलात उठा कर ले जाता. तथा उन्हें जबरदस्ती अपनी रानी बनाता. या उनका शील हरण करता. फिर उसे क्या पडी थी क़ि सीता को अशोक वाटिका में रखा? उसकी सेवा में विष्णु भक्ता त्रिजटा को लगाता?
यदि राम के लिए नारी एक सर्वथा त्याज्य एवं ताड़ना की ही अधिकारिणी थी तो फिर राजसूय यज्ञ के समय सीता के अभाव में सोने की सीता की मूर्ती बनवाकर क्यों रखवाते? और उस यग्य में उस औरत की चरण वन्दना करवाते?
अरे चूहों! हल्दी की एक गाँठ के चक्कर में क्यों अपना सर्वनाश करवाते हो? क्यों आधे अधूरे पाठ से द्रोणाचार्य की तरह अपनी जान गंवाना चाहते हो? जिन्होंने युद्धिष्ठिर की पूरी बात नहीं सुनी क़ि अश्वत्थामा कौन मरा? हाथी या मनुष्य? और अपने अधूरे ज्ञान के कारण उन्हें अपने प्राणों से हाथ धोना पडा.
संभवतः ही ऐसा कोई ग्रन्थ होगा जहाँ पर राम चरित मानस से ज्यादा औरतो की महत्ता वर्णित हो.
आज के तुलसी औरतो का कितना सम्मान कर रहे है? क्या इसका भी वर्णन यहाँ आवश्यक है? मेरी समझ से इतने स्वच्छ वर्णन की कोई आवश्यकता नहीं है.
और नारी वह भी है जो लोक लाज के भय से अपने नाजायज नवजात शिशु को झाडी या कचरे के डब्बे में फेंक आती है. नारी वह भी है जो अपनी वासना की भूख मिटाने के लिए किटी पार्टी, बियर बार, और भी ऐसी कितनी पार्टियां या मसाज सेंटर अटेंड करती है.
और आज के तुलसी इन्ही नारियो के गुण ग्राहक है.
धन्य हो ऐसे महान ज्ञानवान एवं आधुनिकता माता के वर प्राप्त तुलसी!
पाठक

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अजय यादव के द्वारा
October 27, 2012

आदरणीय पाठक जी, इतनी सुंदर व्याख्या और प्रस्तुति के लिए तहेदिल से आपका आभारी हूँ |शायद इतनी सुंदर व्याख्या मैंने पहली बार ही पढ़ा हैं |

    October 27, 2012

    भाई अजय यादव जी, यह मेरे दिल की भड़ास है। जिसे मैंने कुछ एक कुतर्कियों के कुतर्क से आजिज़ होकर वाक्य बद्ध कर दिया। किन्तु आप के प्रशंसा पूर्ण उदगार मेरे विचार के संबल बन गए। धन्यवाद।

chaatak के द्वारा
September 21, 2012

पाठक जी, सही और सटीक व्याख्या की आपने फितूरी और बददिमाग लोगों को ये बात समझ में नहीं आएगी| हार्दिक बधाई!

    September 22, 2012

    आदरणीय चातक जी, देखें आप का यह सन्देश कुछ लोगो को पसंद आता है या नहीं. शुक्रिया.

vibhootiprasad के द्वारा
September 21, 2012

पाठक जी, नमस्कार, आप के लेख को पढ़कर बहुत हंसी आ रही है. बेचारा तुलसी पर जिस किसी ने भी आक्षेप लगाया होगा. निश्चित रूप में वह अपना माथा पीट रहा होगा. बताईये भला, जो बेचारा पत्नीव्रता, रत्नावली के मोह पास में बंधा, वियोग को न सह सकने वाला, मुर्दे को नाव समझ कर उफनती नदी को पार कर गया, उसे डूबने तक का भय नहीं रहा, सांप को रस्सी समझ कर लटकते हुए पत्नी के अंतर्कक्ष तक पंहुचा, प्राणों तक का मोह नहीं रहा, उस तुलसी को नारिद्रोही कहा!!!!!!!!! और वह नारी! जिसने उस महा वियोगी के मनोभाव को न समझ कर दुत्कार दिया!! क्या वह उसकी व्याहता नहीं थी? उसके इस दुत्कार का क्या तात्पर्य आज के आलोचक निकाल सकते है? अस्थि चर्म मय देह मम तामें ऐसी प्रीती. तैसी जो श्री राम मंह होती न तव भय भीति. कही ऐसा तो नहीं क़ि इसी से गुस्सा होकर तुलसी ने लिख दिया क़ि- शूद्र गंवार ढोल पशु नारी. सकल ताड़ना के अधिकारी. हाय रे आलोचक एवं आलोचना का नज़रिया !!!!! धन्य हो आज के तुलसी !!!!!! मैंने इसी मंच पर किसी ब्लॉग में पढ़ा हूँ—– सूर सूर तुलसी शशी, उडुगन केशव दास. अब के कवी खद्योत सम जहाँ तहं करत प्रकास. इसकी सार्थकता को प्रत्येक कवी अपनी अपनी कसौटी पर परखें.

September 13, 2012

आदरणीय गुरुवर पंडित राय जी, मै अपनी इस रचना पर आप का विचार अवश्य जानना चाहूंगा. प्रणाम

    September 13, 2012

    प्रिय पाठक जी इससे ज्यादा और क्या कहा जा सकता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम मात्र एक कैकेयी के कहने पर अपना सर्वस्व छोड़ कर अपने जीवन के सुहावने चौदह वसंत जंगल, पहाड़, खोह में घूमते एवं युद्ध में व्यतीत कर दिए. जौ केवल पितु आयसु ताता. तौ जनि जाहू जानि बडि माता. जौ पितु मातु कहेउ बन जाना. तों कानन शत अवध समाना. यह बचन कौशल्या जी का है हे राम! यदि केवल पिता का आदेश वन गमन के लिए है. तो पिता से माता को बड़ी जान कर वन मत जाओ. किन्तु यदि पिता के साथ माता ने भी वन जाने के लिए आदेश दिया हो तो अवश्य वन जाओ. वन तुम्हारे लिए सैकड़ो अवध के सामान सुख कारी होगा. इस लेख पर व्यक्त विविध विचार अच्छे लगे. लेख के लिए साधुवाद.

    September 13, 2012

    प्रिय पाठक जी आप ने अपने पिछले लेख “ज़रा इस महर्षि को देखें” पर कमेंट्स प्रतिबंधित कर रखा है. क्योकि उस लेख पर कोई भी प्रतिक्रया नहीं हो पा रही है. आप ने इस लेख में अनेक तथ्यों को या तो जानते नहीं है, या फिर विषय से सम्बंधित न होने के कारण उनका उल्लेख नहीं किया है. आज उनकी बाईसवीं पीढी चल रही है. उन्ही के वंशज श्री स्वरूपानंद सरस्वती का निधन वर्ष 1990 में हुआ है. जो एक सफल एवं सच्चे तपस्वी रहे है. किन्तु यह दुनिया है. जब भगवान के आलोचक इस दुनिया में उपलब्ध है. तो फिर मनुष्य की क्या विसात? उनकी भी लोगो ने बाद में आलोचना शुरू कर दी थी. चूंकि आप ने कुछ सोच कर इस लेख के चरित्रों का वह नाम नहीं लिखा है जो संसार में प्रचलित हुआ. आप ने सब नाम उनके बाल्य काल का ही लिखा है. इस लिए मै भी उनका प्रचलित नाम नहीं लिख रहा हूँ. आप एक बार नैनीजोर गाँव के ही श्री राम सनेही शर्मा जो वाराणसी के मुमुक्षु भवन में रहते है, उनसे मिलिए. आप को और भी बहुत सी चीजें जानने एवं देखने को मिलेगी. पाठक जी, आप बुरा न मानियेगा. मुझे पता नहीं आप के इस लेख से क्यों अरुचि पैदा हो रही है.

Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
September 12, 2012

पाठक जी, सत्य बात ये है की आस्था के मारों को भी सत्य पूरी तरह से नज़र नहीं आता, वे कभी एक साधू से, कभी दुसरे बाबा से जीवन भर धोखा खाते रहते है, अधिक पाने की लालसा में, अपने कष्टों को दूर करने की लालसा में और अधिक कष्ट सहते रहते हैं, ऐसा ही होता रहता है भारत की ज़्यादातर जनसँख्या के साथ जो कभी निर्मल बाबा, कभी सत्य साईं, कभी राधे माँ, कभी नित्यानंद जैसे न जाने कितने ढोंगियों के चक्कर में पड़ा रहता है और उनकी महानता का गुणगान करता रहता है! तुलसी जी वैसे तो महान साहित्यकार थे ही लेकिन आप सीता जी के अंत और उनकी अग्नि परीक्षा पर थोडा स्पष्टीकरण ज़रूर दीजियेगा….. बाकी मनु जैसे विधि निर्माता, उत्तर वैदिक काल से लेकर वर्तमान युग तक नारी के सम्मान या असम्मान पूर्ण जीवन का भी आपको ज्ञान ज़रूर होगा!

    September 13, 2012

    महानुभाव मै तुलसी तो नहीं, किन्तु जितना पढ़ा हूँ उतने के स्तर पर मै भर सक कुछ कह रहा हूँ. सीताजी की अग्नि परीक्षा क्यों ली गयी? जल परीक्षा, पहाड़ से फेंक कर या शूली पर चढ़ाकर भी परीक्षा ली जा सकती थी. कारण यह था की ज़रा शुरू में ही ध्यान दें- “सुनहु प्रिया व्रत रुचिर सुशीला. अब हम करब कछुक नर लीला. तब लगि करहु अग्नि मंह वासा. जब लगि करहु निशाचर नासा.” अर्थात हे सीता! जब तक मै निशाचरों का संहार करता हूँ, तब तक तुम अग्नि में सुरक्षित रहो. अब श्री राम के लिए तो सीता की अग्नि परीक्षा का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता. किन्तु हम जैसे कुंठा ग्रस्त, जो समाज में सुधार लाने के लिए अपने आप को कृत संकल्प मानते है. किन्तु समाज के सञ्चलन एवं नियंत्रण के लिए आधारभूत तथ्यों की तरफ, उनके औचित्य, आवश्यकता एवं मापदंड की तरफ ध्यान नहीं देते है, और एक तरफा निर्णय ले लेते है, ऐसी परीक्षाओं की अवश्य अपेक्षा करते है. सम्पूर्ण राम चरित मानस ही इस कथा के इर्दगिर्द भ्रमण करता है की एक मात्र सीता की रक्षा, मुक्ति एवं सम्मान के लिए खर, दूषण, त्रिशिरा, बाली, रावण, कुम्भ करण, मारीच, मेघ नाद आदि सब का संहार करना पडा. राम का और उद्देश्य क्या था? क्या वह लंका पर राज्य करने के लिए लंका विजय किये थे? शबरी के जूठे बेर खाने का क्या तात्पर्य? सीता के अंत के बारे में, मै फिर वही बात दुहराना चाहूंगा, सीता जी का जन्म किस स्रोत से हुआ था? और उनका अवसान कहाँ हुआ? उनके लिए और कोई अन्या स्थान या स्रोत अवसान के लिए क्यों नहीं मिला? वर्त्तमान नारियो के सामान कही फानी पर लटक जाती, ज़हर खा लेती. और भी अन्य साधन प्राण त्यागने को था. वैदिक काल की नारियो की स्थिति के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान होने का दावा मै किस आधार पर सकता हूँ? किन्तु वैदिक काल में ही रचित हिन्दू धर्म के नियमन, नियत्रण, सञ्चालन एवं परिसीमन के रीढ़ कहे जाने वाले ऋग्वेद पर ज़रा ध्यान दें- इस वेद में सम्पूर्ण ग्यारह ही ऋचाएं है. उनमें उषः सूक्त, देवी सूक्त, लक्ष्मी सूक्त किसके लिए लिखे गए है? नारियो के लिए या अनारियो (पुरुषो) के लिए? अब रही मनु स्मृति की बात. ज़रा उन्नीसवां अध्याय देखिये. यज्ञार्थं यत्रैव समिधा सकालानी परिगृह्यतानि. तत्रैव खलु पाणिगृहीता हीनम यज्ञं विनश्यते. यज्ञ के लिए समिधा एवं अन्य सकल सामग्री आवश्यक है. उसी तरह बिना धर्म पत्नी के किया गया यज्ञ विनाश कारक होता है. और भी ऐसे ही प्रसंग मनु स्मृति में देखे जा सकते है. रही बात आस्था की, तो यह आस्था ही है की लोग अपनी बीमारी के लिए एक डाक्टर से दूसरे डाक्टर के पास दौड़ लगाते रहते है. किसी के पास मरीज मर जाता है. तो किसी के पास इतनी भयंकर फीस होती है की उसी के सदमे से मरीज दम तोड़ देता है. जब की सभी डाक्टर एम् बी बी एस ही होते है. किसी भी डाक्टर के पास आदमी विशवास एवं भरोसे की कारण ही एक डाक्टर के पास जाता है. उसे धरती का ईश्वर मान कर उसकी शरण में जाता है. किन्तु क्या हर एक के पास मरीज अपनी बीमारी ठीक करा पाटा है? कृपया इस पर जरूर विचार कीजिएगा. मैंने तो अपनी मति के अनुसार विवरण दे दिया. मुझे ज्ञात नहीं, यह आप के लिए पर्याप्त है या नहीं. वैसे मुझे गर्व है की मै भी कुछ ऐसा लिख सकता हूँ, जिस पर लोग सार्थक एवं उचित टिप्पड़ी कर सके. धन्यवाद पाठक

ashishgonda के द्वारा
September 12, 2012

आदरणीय! सादर,, यद्यपि आपके लेख और उस किये गए प्रतिक्रियाओं से ही यह सिद्ध होता है कि तुलसीदास जी नारिओं का कितना सम्मान करते थे, तथापि मैं भी कहना चाहता हूँ कि अगर वे सम्मान न करते तो अपने महाग्रंथ श्रीरामचरित मानस का आरम्भ सरस्वती माता की वंदना से क्यूँ करते? उन्होंने सबसे पहले श्री गणेश नहीं, सरस्वती का आवाहन किया है,,पहले श्लोक में ही….

    September 13, 2012

    आदरणीय महोदय, किसी भी विषय या वस्तु को हम अपने अलग अलग नज़रिए से देखते है. यदि किसी को राम चरित मानस में किसी तथ्य से कोई खोट नज़र आया है. तो यह उस व्यक्ति के देखने या विचार करने का तरीका होगा. यह आवश्यक नहीं है की हर व्यक्ति किसी भी चीज को एक ही तरीके से देखे. आप ने संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसी दास को नारी के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने वाले के रूप में देखा. किन्तु किसी को तुलसी नारियो के पतन का कारण मानने लगे. यह सत्य है या मिथ्या, इसका विवरण, विवेचन एवं सत्यापन आप को प्रस्तुत करना है. आप ने उदाहरण से इसे प्रस्तुत किया, मई आप का आभारी हूँ.

भाव नाथ के द्वारा
September 11, 2012

आदरनीय पाठक जी जिस किसी ने भी तुलसी की आलोचना की है, उसका उद्देश्य तुलसी या रामचरित मानस का अपमान नहीं बल्कि अपना प्रचार प्रसार किया है. आसान प्रचार प्रसार पाने का सरल तरीका है कि किसी भी बड़े, श्रद्धेय एवं पूज्य-प्रतिष्ठित शख्शियत पर छीटाकशी कर दो.

    September 18, 2012

    प्रतीत तो ऐसा ही हो रहा है. किन्तु भाव नाथ जी, आसमान का थूका मुंह पर ही वापस आता है.

गिरिजा शरण के द्वारा
September 11, 2012

आदरनीय पाठक जी जाको प्रभु दारुण दुःख दीना. ताकी मति पाहिले हर लीना. जब भगवान किसी का विनाश करना चाहते है. तो पहले उसकी बुद्धि को चौपट कर देते है. उंच-नीच, उपयुक्त-अनुपयुक्त, भला-बुरा तथा नैतिकता-अनैतिकता के निर्धारण की क्षमता नष्ट कर देते है. इसी का परिणाम है कि आज तुलसी को अपनी कलुषित मानसिकता का शिकार बनाया जा रहा है. अन्यथा जिस तुलसी ने नारी की गरिमा, गुरुता एवं महत्ता के कारण – “पर तीय नारी लिलार गुसाई. ताजिय चौथ चन्दा की नाई.” कह कर उसे सामान्य से विशेष बना दिया. उस तुलसी पर ऐसा आक्षेप विद्रूप एवं कलुषित मानसिकता का ही परिचायक हो सकता है. हे राम!

    September 18, 2012

    निश्चित किसी मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति ही तुलसी जैसे संत को नारि विरोधी कह सकता है. आप श्री राम से प्रार्थना करें क़ि उसकी यह व्याधि दूर होवे.

Santosh Kumar के द्वारा
September 11, 2012

श्रद्धेय ,..सादर प्रणाम बहुत ही शानदार विवेचना ,.कुछ कहने को शेष नहीं ,..सादर अभिनन्दन

    September 18, 2012

    मर्यादा पुरोषोत्तम भगवान श्री राम की परम पावनी पाप नसावनी सकल कली कलुष विध्वंशिनी पवित्र गाथा के रूप में समस्त विश्व में राम राज्य–एक सम्पूर्ण राज्य की स्थापना का सन्देश देने वाले अद्भुत अद्वितीय एवं महान ग्रन्थ के वरद रचनाकार संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसी दास के प्रति आप का उदगार श्लाघ्य है.


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