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क्या आप इस सच्चाई से मुँह मोड़ सकते है?

Posted On: 3 Oct, 2012 Others में

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क्या आप इस सच्चाई से मुँह मोड़ सकते है?
(पिछले लेख “बाँझ क्या जाने प्रसूति क़ी पीड़ा?” से आगे)

अनेक वर्गों में बँट कर बिखर जाय. परस्पर द्वेष एवं ईर्ष्या जन्म ले ले. लोगो में जो एक पारस्परिक सम्बन्ध—–चाहे वह व्यवसाय या कर्म को लेकर चला आ रहा है या फिरसामंजस्य स्थापित करने के लिये बनाए गये सामाजिक नियम हो.

अभी आज भी शादी विवाह में जब तक नाउनि (नाई क़ी पत्नी) विवाह के समय लड़की या अशौच के बाद घर के सदस्यों का नाखून नहीं काटेगी, परिवार शुद्ध नहीं होगा. यह अधिकार केवल उसे ही मिला है. क्या नेलकटर से नाखून नहीं काटा जा सकता? क्या ज़रूरी है कि उसे मात्र नाखून काटने के लिये इतना ढेर सारा दान या धन दिया जाय?
विवाह में मिट्टी के बर्तन बाज़ार में भी मिल सकते है. लेकिन जब तक कुम्हार कलश लेकर घर नहीं आयेगा, उसका “परिछन” नहीं होगा, तब तक विवाह का कार्य क्रम आगे नहीं बढेगा. क्या वह बर्तन बाज़ार से नहीं खरीदा जा सकता है?
जब तक विवाह के समय अपना चमार डुगडुगी नहीं बजाएगा, लावा, परिछन आदि शुभ नहीं होगा? अब इतने छोटे छोटे कामो के लिये चमार, कुम्हार, हजाम आदि को भारी भरकम धन राशि देने क़ी क्या आवश्यकता है?
ये सब ऐसी मान्यताएं है जिनके द्वारा समाज के विविध वर्गों में सम्बन्ध, प्रेम एवं एक मिठास भरी प्रगाढ़ता जन्म लेती है. प्रत्येक समुदाय एक विशेष कारण से एक दूसरे से बंधा हुआ रहता है. सबका काम , उत्तरदायित्व बँटा रहता है.
अब अगर कोई कहे कि सबने लूट मचा रखी है, तों निश्चित रूप से वह कभी भारतीय हिन्दू समाज क़ी विविध मान्यताओं से दूर दूर तक परिचित नहीं है. उसे इसकी गुरुता, मिठास एवं आवश्यकता का कोई अनुमान नहीं है.
विवाह के समय लड़कर, झगड़ा कर के कँहार, गोंड, हजाम, चमार आदि सब अपना हक माँगते है. और देने वाला कभी रूठ कर और फिर बुलाकर उन्हें वह रक़म देता है. यह एक ऐसी रस्म है जिसे देने एवं लेने दोनों ही तरह से एक प्रसन्नता का अनुभव होता है. मैंने कही ऐसा नहीं देखा जहाँ झगड़ा कर के भी हजाम, कँहार तथा चमार आदि को उनकी दक्षिणा न डी गयी हो- थोड़ा हो या ज्यादा हो. कारण यह है कि यह प्रत्येक हिन्दू परिवार में शुभता का द्योतक माना जाता है.
लेकिन सही बात है, जो केवल नाम का हिन्दू हो, जिसने कभी हिन्दू रीति-रिवाज के बारे में जानने क़ी कोशिस नहीं क़ी हो, जो केवल धन लूटकर अपना घर भरना ही जाना हो, जो अपने स्वार्थ के चलते समाज में एक सम्बन्ध बनाने को पाखण्ड मानता हो, जिसे समाज के विविध वर्गों में फूट डालना ही आता हो वह इन मान्यताओं का तों विरोध करेगा ही.
ये जानवर समाज सुधारक समाज में द्वेष का बीज तों बो सकते है, किन्तु उन्हें बाँध कर रखने क़ी इच्छा कभी नहीं जागृत होगी.
तभी तों ये समाज सुधारक आज ब्राह्मणों को दोष दे रहे है. तथा उन्हें लुटेरा आदि कह रहे है. उसके बाद हजाम को लुटेरा कहने क़ी बारी आयेगी. फिर कँहार एवं चमार आदि क़ी बारी आयेगी. क्योकि नाई भी तों दो हाथ एवं दो पैर के नाखून काट कर सैकड़ो रुपये एवं कई पसेरी अनाज ले लेता है.
ये घातक समाज सुधारक एक एक कर के हिन्दुओं में फूट ड़ाल कर उनमें विष का बीज बोना तथा ईर्ष्या, द्वेष एवं खूनी जंग करवाने पर अमादा है. उन्हें इन मान्यताओं के अनुकूल पहलू नज़र नहीं आते है. कारण यह है कि इनको मालूम ही नहीं है कि समाज किसे कहते है. इनकी दृष्टि में समाज क़ी परिभाषा यह है कि जहाँ पर न तों कोई नियम हो, न कोई प्रतिबन्ध, केवल उन्मुक्तता एवं स्वच्छंदता हो.
इनको यह नहीं मालूम कि पायजामे को भी कमर से बांधने के लिये नाड़े क़ी ज़रुरत होती है. धोती को भी पहनते है सुखकर लगने के लिये, किन्तु फिर भी उसमें गाँठ लगानी पड़ती है.
मै इस ब्लॉग से समस्त हिन्दू समाज को सचेत करना चाहूँगा कि ऐसे घोर आततायियों एवं राक्षसों से सचेत रहें.

पाठक.

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bharodiya के द्वारा
October 13, 2012

पाठकभाई —बांज क्या जाने पिड पराई—लेख के लिए ये बात मैंने लिखी थी । आपने ईस लेख में वही बात कह दी है । ((((पाठकभाई जरा और उपर देखो । हिन्दु धर्म ही सब नास्तिकों को अखरता है । आपने नास्तिकों को समाज सुधारक कहा गलत कहा । वो चुहे हैं । हिन्दु धर्म को कुतर कुतर के खानेवाले । कर्मकांडी पंडित उस का प्रथम शिकार हो जाये वो स्वाभाविक है । )))) बात बिलकुल सही है, ईन रक्षसों से बचना होगा ।

गिरिजा शरण के द्वारा
October 5, 2012

मै श्री भावनाथ जी की बातो से सर्वथा सहमत हूँ.

भाव नाथ के द्वारा
October 5, 2012

बिलकुल सही बात. पाठक जी आप की बातो से मै सहमत हूँ. जिसको लूट कहा जा रहा है. वह लूट नहीं बल्कि परम्पराओं के द्वारा एक दूसरे को परस्पर नजदीक लाने और एक सम्बन्ध में बांधने की कड़ी है. शादी, श्राद्ध या अन्य पर्वो पर ब्राह्मणों, मजदूरों, कँहार, धोबी, चमार, मुसहर, चौकीदार, नाइ आदि सब अपनी बिदाई माँगते है. सब नेग माँगते है. कम मिलने पर लड़ते है. झगड़ते है. रूठते है. फिर मानते है. अब कोई कहे क़ि चमार तो सिर्फ आधा घंटा डुगडुगी बजाया तथा इतना आटा, चावल और पैसा मांग रहा है. इसने क्या लूट मचा राखी है? इसी प्रकार चौकीदार आदि सभी माँगते, लड़ते एवं झगड़ते है. यह सदा से परम्पराओं में चला आया है. जो ऐसे अवसरों पर अच्छा भी लगता है. सही बात है, जिसने इन सब के महत्व, मिठास, एवं सम्बन्ध को जाना ही नहीं, जिसने किसी दूसरे को एक पैसा कभी दिया नहीं, जिसने समाज को सदा ही दूसरे रूप में देखा है, जहाँ पर मानव नहीं बल्कि मानव शरीर के रूप में एक मशीन होते है, उसे इन सबके बारे में क्या पता? वह तो सबको ऐसा ही बनाना चाहेगा ही. आज ब्राह्मणों को, कल धोबी को, उसके बाद नाइ आदि सब को लूटेरा कहेगा ही. सही बात है. यह समाज सुधार नहीं बल्कि समाज में विभेद पैदा करना है. बहुत अच्छा.


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