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आततायी राम एवं मूर्ख बन्दर हनुमान---लोग कैसे इनकी पूजा करते है?

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आततायी राम एवं मूर्ख बन्दर हनुमान—लोग कैसे इनकी पूजा करते है?

मर्यादा, आदर्श  एवं सदाचार की दुहाई देने वाले पौराणिक चरित्र बड़े ही आदर के साथ याद किये जाते है। विविध कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकों में इसे बड़े ही महत्ता के रूप में प्रतिष्ठित भी किया गया है। किन्तु उनके आचरण से मिलने वाली जघन्य शिक्षा की तरफ कोई क्यों नहीं देखता? उनके चरित्र चित्रण से बालको या विद्यार्थियों के मनो मष्तिष्क पर क्या छाप पड़ेगी, इसे किसी ने कभी सोचा है?

उदाहरण के लिए हनुमान को उनकी स्वामी भक्ति, ब्रह्मचर्य, शक्ति संपन्न एवं सदाचार के लिए याद किया जाता है। एक अति उत्कृष्ट चरित्र के रूप में उन्हें याद किया जाता है।
लेकिन क्या आप बता सकते है की उन्होंने स्वर्ण नगरी लंका को जलाकर विश्विक संपदा का जो नाश किया, वह कहाँ तक उचित कहा जा सकता है? एक समूचे सोने के नगर को ही जलाकर तहस नहस कर दिया गया। क्या यह अमानुषिकता नहीं है? यदि वह संपदा जनता में बाँट दी जाती तो कितने लाख लोग धन संपन्न हो गए होते? कितने लोग दर दर भीख नहीं माँगते। गरीबो का उद्धार हो जाता।
किन्तु उस बन्दर ने  कुकृत्य कर डाला।
क्या इस काम के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाने वाले राम ने उस बन्दर को दण्डित किया? नहीं किया। अर्थात उनकी भी इस काम में सम्मति अवश्य थी। तभी तो इतना सब करने के बावजूद भी उन्होंने उस सत्यानाशी बन्दर को अपना मुख्या सेवक बनाकर रखा। यही नहीं बल्कि आज भी बड़े जोर शोर से इस गाथा को इस बन्दर की वीरगाथा के रूप में गायी जाती है। इस बन्दर की हनुमान चालीसा पढ़कर रोग शोक एवं भय आदि से छुटकारा पाने का नौटंकी किया जाता है।
अब बात उठती है राम की। जिन्हें हिन्दू भगवान के रूप में पूजते है। क्या वह एक आततायी, निरंकुश, स्वार्थी एवं राक्षस नहीं थे? मात्र उन्होंने अपनी प्रेयसी सीता के लिए समूचे लंका का विध्वंश कर डाला। माना की रावण ने उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया था। किन्तु उस एक औरत के लिए समूचे लंका की औरतो को विधवा बनाकर उन्हें तडपाना एक दानवीय कृत्य नहीं तो और क्या है?
क्या त्रिशिरा, बालि, खर दूषण, मारीच आदि ने उनकी अयोध्या पर चढ़ाई की थी? तो जब उन बनवासियो ने उनके राज काज में हस्तक्षेप नहीं किया तो उन्हें क्या अधिकार है की वह दूसरो के राज काज में हस्तक्षेप करें?आखिर उनका नाश करना कहाँ तक शोभनीय एवं संवैधानिक है?
एक तो स्वयं आराम से राज काज कर रहे इन जंगलियो के बीच गए। और फिर जाकर उनसे लड़ाई मोल कर उनके प्रशासनिक काम में दखल देना। यह कौन सी मर्यादा  है? उन्हें अपने माँ बाप को मारना चाहिए था। जिन्होंने षडयंत्र कर के उन्हें जंगल भेज दिए। अपना हक़ छोड़ दिए, तथा दूसरे के हक पर डाका डालने पहुँच गए।
कौन सी शिक्षा इनके चरित्र से शिक्षार्थियों को मिल सकती है। क्या यही शिक्षा दी जानी चाहिए की अपना नुकसान होने पर एक समूचे समुदाय का सर्वनाश कर डालो? राष्ट्रीय या विश्व संपदा का तहस नहस कर डालो?
आखिर किस बुद्धिमत्ता के लिए हनुमान की पूजा की जाती है? किस उच्च भूमिका के लिए राम को भगवान के रूप में पूजा जाना चाहिए?
मनस्वियों को इस पर विचार करने की  है।
पाठक

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pitamberthakwani के द्वारा
October 12, 2012

प्रकाशजी, आपका अकाट्य तर्क तो है! पर लोगों की जागरूकता के अभाव में किसी ने सोचा ही नहीं इस बात को?,हम सब आपके इस सच को उजागर करने के लिए आभारी है, और रहेंगे!


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