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प्रकाश चन्द्र पाठक


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मंच की दादागिरी एवं ब्लॉगर माफिया.

Posted On: 28 Apr, 2012  
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श्री हिज़डा चालीशा

Posted On: 28 Apr, 2012  
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बाल विवाह पर चिल्ल पों क्यों?

Posted On: 22 Apr, 2012  
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जागरण मंच के महापुरुष एवं उनका महाज्ञान

Posted On: 20 Apr, 2012  
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विचित्र जागरण ब्लॉग ????? कोई बताये तों सही???

Posted On: 19 Apr, 2012  
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जागरण मंच-मेरा प्रवेश

Posted On: 19 Apr, 2012  
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जागरण मंच- एक आलोकित दर्पण

Posted On: 18 Apr, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

बिलकुल सही बात. पाठक जी आप की बातो से मै सहमत हूँ. जिसको लूट कहा जा रहा है. वह लूट नहीं बल्कि परम्पराओं के द्वारा एक दूसरे को परस्पर नजदीक लाने और एक सम्बन्ध में बांधने की कड़ी है. शादी, श्राद्ध या अन्य पर्वो पर ब्राह्मणों, मजदूरों, कँहार, धोबी, चमार, मुसहर, चौकीदार, नाइ आदि सब अपनी बिदाई माँगते है. सब नेग माँगते है. कम मिलने पर लड़ते है. झगड़ते है. रूठते है. फिर मानते है. अब कोई कहे क़ि चमार तो सिर्फ आधा घंटा डुगडुगी बजाया तथा इतना आटा, चावल और पैसा मांग रहा है. इसने क्या लूट मचा राखी है? इसी प्रकार चौकीदार आदि सभी माँगते, लड़ते एवं झगड़ते है. यह सदा से परम्पराओं में चला आया है. जो ऐसे अवसरों पर अच्छा भी लगता है. सही बात है, जिसने इन सब के महत्व, मिठास, एवं सम्बन्ध को जाना ही नहीं, जिसने किसी दूसरे को एक पैसा कभी दिया नहीं, जिसने समाज को सदा ही दूसरे रूप में देखा है, जहाँ पर मानव नहीं बल्कि मानव शरीर के रूप में एक मशीन होते है, उसे इन सबके बारे में क्या पता? वह तो सबको ऐसा ही बनाना चाहेगा ही. आज ब्राह्मणों को, कल धोबी को, उसके बाद नाइ आदि सब को लूटेरा कहेगा ही. सही बात है. यह समाज सुधार नहीं बल्कि समाज में विभेद पैदा करना है. बहुत अच्छा.

के द्वारा: भाव नाथ भाव नाथ

पाठक जी, नमस्कार, आप के लेख को पढ़कर बहुत हंसी आ रही है. बेचारा तुलसी पर जिस किसी ने भी आक्षेप लगाया होगा. निश्चित रूप में वह अपना माथा पीट रहा होगा. बताईये भला, जो बेचारा पत्नीव्रता, रत्नावली के मोह पास में बंधा, वियोग को न सह सकने वाला, मुर्दे को नाव समझ कर उफनती नदी को पार कर गया, उसे डूबने तक का भय नहीं रहा, सांप को रस्सी समझ कर लटकते हुए पत्नी के अंतर्कक्ष तक पंहुचा, प्राणों तक का मोह नहीं रहा, उस तुलसी को नारिद्रोही कहा!!!!!!!!! और वह नारी! जिसने उस महा वियोगी के मनोभाव को न समझ कर दुत्कार दिया!! क्या वह उसकी व्याहता नहीं थी? उसके इस दुत्कार का क्या तात्पर्य आज के आलोचक निकाल सकते है? अस्थि चर्म मय देह मम तामें ऐसी प्रीती. तैसी जो श्री राम मंह होती न तव भय भीति. कही ऐसा तो नहीं क़ि इसी से गुस्सा होकर तुलसी ने लिख दिया क़ि- शूद्र गंवार ढोल पशु नारी. सकल ताड़ना के अधिकारी. हाय रे आलोचक एवं आलोचना का नज़रिया !!!!! धन्य हो आज के तुलसी !!!!!! मैंने इसी मंच पर किसी ब्लॉग में पढ़ा हूँ----- सूर सूर तुलसी शशी, उडुगन केशव दास. अब के कवी खद्योत सम जहाँ तहं करत प्रकास. इसकी सार्थकता को प्रत्येक कवी अपनी अपनी कसौटी पर परखें.

के द्वारा: vibhootiprasad vibhootiprasad

प्रिय पाठक जी आप ने अपने पिछले लेख "ज़रा इस महर्षि को देखें" पर कमेंट्स प्रतिबंधित कर रखा है. क्योकि उस लेख पर कोई भी प्रतिक्रया नहीं हो पा रही है. आप ने इस लेख में अनेक तथ्यों को या तो जानते नहीं है, या फिर विषय से सम्बंधित न होने के कारण उनका उल्लेख नहीं किया है. आज उनकी बाईसवीं पीढी चल रही है. उन्ही के वंशज श्री स्वरूपानंद सरस्वती का निधन वर्ष 1990 में हुआ है. जो एक सफल एवं सच्चे तपस्वी रहे है. किन्तु यह दुनिया है. जब भगवान के आलोचक इस दुनिया में उपलब्ध है. तो फिर मनुष्य की क्या विसात? उनकी भी लोगो ने बाद में आलोचना शुरू कर दी थी. चूंकि आप ने कुछ सोच कर इस लेख के चरित्रों का वह नाम नहीं लिखा है जो संसार में प्रचलित हुआ. आप ने सब नाम उनके बाल्य काल का ही लिखा है. इस लिए मै भी उनका प्रचलित नाम नहीं लिख रहा हूँ. आप एक बार नैनीजोर गाँव के ही श्री राम सनेही शर्मा जो वाराणसी के मुमुक्षु भवन में रहते है, उनसे मिलिए. आप को और भी बहुत सी चीजें जानने एवं देखने को मिलेगी. पाठक जी, आप बुरा न मानियेगा. मुझे पता नहीं आप के इस लेख से क्यों अरुचि पैदा हो रही है.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

प्रिय पाठक जी इससे ज्यादा और क्या कहा जा सकता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम मात्र एक कैकेयी के कहने पर अपना सर्वस्व छोड़ कर अपने जीवन के सुहावने चौदह वसंत जंगल, पहाड़, खोह में घूमते एवं युद्ध में व्यतीत कर दिए. जौ केवल पितु आयसु ताता. तौ जनि जाहू जानि बडि माता. जौ पितु मातु कहेउ बन जाना. तों कानन शत अवध समाना. यह बचन कौशल्या जी का है हे राम! यदि केवल पिता का आदेश वन गमन के लिए है. तो पिता से माता को बड़ी जान कर वन मत जाओ. किन्तु यदि पिता के साथ माता ने भी वन जाने के लिए आदेश दिया हो तो अवश्य वन जाओ. वन तुम्हारे लिए सैकड़ो अवध के सामान सुख कारी होगा. इस लेख पर व्यक्त विविध विचार अच्छे लगे. लेख के लिए साधुवाद.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

महानुभाव मै तुलसी तो नहीं, किन्तु जितना पढ़ा हूँ उतने के स्तर पर मै भर सक कुछ कह रहा हूँ. सीताजी की अग्नि परीक्षा क्यों ली गयी? जल परीक्षा, पहाड़ से फेंक कर या शूली पर चढ़ाकर भी परीक्षा ली जा सकती थी. कारण यह था की ज़रा शुरू में ही ध्यान दें- "सुनहु प्रिया व्रत रुचिर सुशीला. अब हम करब कछुक नर लीला. तब लगि करहु अग्नि मंह वासा. जब लगि करहु निशाचर नासा." अर्थात हे सीता! जब तक मै निशाचरों का संहार करता हूँ, तब तक तुम अग्नि में सुरक्षित रहो. अब श्री राम के लिए तो सीता की अग्नि परीक्षा का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता. किन्तु हम जैसे कुंठा ग्रस्त, जो समाज में सुधार लाने के लिए अपने आप को कृत संकल्प मानते है. किन्तु समाज के सञ्चलन एवं नियंत्रण के लिए आधारभूत तथ्यों की तरफ, उनके औचित्य, आवश्यकता एवं मापदंड की तरफ ध्यान नहीं देते है, और एक तरफा निर्णय ले लेते है, ऐसी परीक्षाओं की अवश्य अपेक्षा करते है. सम्पूर्ण राम चरित मानस ही इस कथा के इर्दगिर्द भ्रमण करता है की एक मात्र सीता की रक्षा, मुक्ति एवं सम्मान के लिए खर, दूषण, त्रिशिरा, बाली, रावण, कुम्भ करण, मारीच, मेघ नाद आदि सब का संहार करना पडा. राम का और उद्देश्य क्या था? क्या वह लंका पर राज्य करने के लिए लंका विजय किये थे? शबरी के जूठे बेर खाने का क्या तात्पर्य? सीता के अंत के बारे में, मै फिर वही बात दुहराना चाहूंगा, सीता जी का जन्म किस स्रोत से हुआ था? और उनका अवसान कहाँ हुआ? उनके लिए और कोई अन्या स्थान या स्रोत अवसान के लिए क्यों नहीं मिला? वर्त्तमान नारियो के सामान कही फानी पर लटक जाती, ज़हर खा लेती. और भी अन्य साधन प्राण त्यागने को था. वैदिक काल की नारियो की स्थिति के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान होने का दावा मै किस आधार पर सकता हूँ? किन्तु वैदिक काल में ही रचित हिन्दू धर्म के नियमन, नियत्रण, सञ्चालन एवं परिसीमन के रीढ़ कहे जाने वाले ऋग्वेद पर ज़रा ध्यान दें- इस वेद में सम्पूर्ण ग्यारह ही ऋचाएं है. उनमें उषः सूक्त, देवी सूक्त, लक्ष्मी सूक्त किसके लिए लिखे गए है? नारियो के लिए या अनारियो (पुरुषो) के लिए? अब रही मनु स्मृति की बात. ज़रा उन्नीसवां अध्याय देखिये. यज्ञार्थं यत्रैव समिधा सकालानी परिगृह्यतानि. तत्रैव खलु पाणिगृहीता हीनम यज्ञं विनश्यते. यज्ञ के लिए समिधा एवं अन्य सकल सामग्री आवश्यक है. उसी तरह बिना धर्म पत्नी के किया गया यज्ञ विनाश कारक होता है. और भी ऐसे ही प्रसंग मनु स्मृति में देखे जा सकते है. रही बात आस्था की, तो यह आस्था ही है की लोग अपनी बीमारी के लिए एक डाक्टर से दूसरे डाक्टर के पास दौड़ लगाते रहते है. किसी के पास मरीज मर जाता है. तो किसी के पास इतनी भयंकर फीस होती है की उसी के सदमे से मरीज दम तोड़ देता है. जब की सभी डाक्टर एम् बी बी एस ही होते है. किसी भी डाक्टर के पास आदमी विशवास एवं भरोसे की कारण ही एक डाक्टर के पास जाता है. उसे धरती का ईश्वर मान कर उसकी शरण में जाता है. किन्तु क्या हर एक के पास मरीज अपनी बीमारी ठीक करा पाटा है? कृपया इस पर जरूर विचार कीजिएगा. मैंने तो अपनी मति के अनुसार विवरण दे दिया. मुझे ज्ञात नहीं, यह आप के लिए पर्याप्त है या नहीं. वैसे मुझे गर्व है की मै भी कुछ ऐसा लिख सकता हूँ, जिस पर लोग सार्थक एवं उचित टिप्पड़ी कर सके. धन्यवाद पाठक

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

पाठक जी, सत्य बात ये है की आस्था के मारों को भी सत्य पूरी तरह से नज़र नहीं आता, वे कभी एक साधू से, कभी दुसरे बाबा से जीवन भर धोखा खाते रहते है, अधिक पाने की लालसा में, अपने कष्टों को दूर करने की लालसा में और अधिक कष्ट सहते रहते हैं, ऐसा ही होता रहता है भारत की ज़्यादातर जनसँख्या के साथ जो कभी निर्मल बाबा, कभी सत्य साईं, कभी राधे माँ, कभी नित्यानंद जैसे न जाने कितने ढोंगियों के चक्कर में पड़ा रहता है और उनकी महानता का गुणगान करता रहता है! तुलसी जी वैसे तो महान साहित्यकार थे ही लेकिन आप सीता जी के अंत और उनकी अग्नि परीक्षा पर थोडा स्पष्टीकरण ज़रूर दीजियेगा..... बाकी मनु जैसे विधि निर्माता, उत्तर वैदिक काल से लेकर वर्तमान युग तक नारी के सम्मान या असम्मान पूर्ण जीवन का भी आपको ज्ञान ज़रूर होगा!

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

के द्वारा: गिरिजा शरण गिरिजा शरण

आदरणीय पाठक जी आतंक वादी भी पहले हिंदी बोलना सीखते है. फिर हिन्दुओं की तीर्थ स्थलों की रेकी करते है. उसके बाद उस पर हमला करते है. ठीक इसी तरह कुछ आतंक वादी दिखावटी हिन्दू बनकर और वास्तव में गैर हिन्दू मज़हब के एजेंट के रूप में हिन्दुओं, हिन्दू धर्म एवं हिन्दू संस्थाओं जैसे मंदिर एवं मठो पर अपने शब्द वाण से हमला कर रहे है. किन्तु जब पकडे जाते है तो पता चलता है क़ि यह तो दिखावटी हिन्दुस्तानी है वास्तव में यह विदेशी एवं गैर हिन्दू है. जिसका उद्देश्य जिस किसी भी तरह हो सके हिन्दुओ की आलोचना एवं निंदा करें एवं उसकी महिमा को खंडित करें. किन्तु उदाहरण है क़ि प्राचीन काल से लेकर आज तक समाज सुधारक के नाम पर डंका पीटने वाले हिन्दू धर्म एवं परम्परा विरोधी दो पाए जानवरों का अवतार हुआ और उनका सर्वनाश भी हुआ. किन्तु हिन्दू धर्म आज भी विराज मान है. आप का उद्धरण सराहनीय है.

के द्वारा: bharati bharati

श्री संतोष कुमार सिंह जी ऐसा कभी संभव ही नहीं है. सब एक साथ न तो सुखी रह सकते है. और न तो यह उचित ही होगा. एक वकील समाज कभी डाक्टर समाज के साथ ताल मेल बना ही नहीं सकता है. एक नास्तिक का सामंजस्य एक आस्तिक के साथ सर्वथा असंभव है. एक शराबी का एक सदाचारी के साथ कभी तालमेल नहीं हो सकता है. एक वास्तविक ब्राह्मण का एक व्यभिचारी के साथ रहना कभी संभव नहीं है. जो मांसाहारी है उसे शाकाहारी के साथ नहीं रखा जा सकता है. पानी में रहने वाली मछली का आकाश में उड़ने वाले पक्षी के साथ क्या सम्बन्ध? ब्राह्मण भोज ब्राह्मण भोज है. उसकी कुछ अलग रीतियाँ है. कुछ अलग आचार एवं विधि है. अन्य लोगो के खान-पान एवं आचार-विचार में बहुत अंतर है. यह मान्यता बहुत सोच समझ कर स्थापित की गयी है. जैसा की मै पहले ही कह चुका हूँ, ब्राह्मण यदि आचार-संस्कार भ्रष्ट होकर शूद्रवत व्यवहार करने लेगे तो निश्चित रूप से वह सम्मान का पात्र नहीं है. किन्तु कुवें में चाहे पानी रहे या न रहे वह कुवां ही कहलायेगा. किन्तु जब कुवां पाट कर के समतल कर दिया जाएगा तो वह चाहे जो कहलाये. इस लिए ब्राह्मण यदि अपने कर्त्तव्य से विमुख हो जाय तो अवश्य वह धार्मिक कृत्यों के लिए अयोग्य है. किन्तु वह ब्राह्मण तब तक कहलायेगा जब तक वह कोई ब्राह्मणेतर कार्य न करने लगे. क्षत्रिय तब तक क्षत्रिय कहलायेगा जब तक वह कोई क्षत्रिय कर्म से हटकर कोई अन्य कर्म न करने लगे. इस लिए यह कहना की कोई ब्राहमण अपने ब्राह्मण का कर्म नहीं करता है. इसलिए वह ब्राह्मण नहीं कहलायेगा, यह अनुचित है. मुझे उम्मीद है, आप इस पर गहराई से विचार करेगें.

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

श्री संतोष कुमार जी मुझे तों पता है कि ऋग्वेद का ग्यारहवां मंडल जिस ऋषि क़ी ऋचाओं का संग्रह है वह ऋषि उस जाति से सम्बंधित थे जिसे आज भारत में अनुसूचित जन जाति के नाम से जाता है. स्वयं महर्षि वेद- व्यास जो थे वह एक मल्लाह या केवट क़ी पुत्री मत्स्यगंधा (मत्स्योदरी) के गर्भजात थे. विश्वामित्र जी जन्म से ब्राह्मण नहीं अपितु क्षत्रिय थे. और इन्होने ही वैदिक एवं पौराणिक मान्यताओं को तरजीह दी थी. जैसा कि वर्णन मिलता है. तों मुझे तों यही लगता है कि वैदिक काल में या पौराणिक काल में जातिगत भेदभाव नहीं था. किन्तु कर्मगत भेदभाव अवश्य था. जो होगा ही. किन्तु आज कुछ एक निकृष्टबुद्धि, संकीर्ण मानसिकता एवं घृणित सोच वाले समाज में आ गये है. जिन्हें केवल ब्राह्मण ही समाज में दोषी नज़र आते है. कौन काम करता है तों शुल्क नहीं लेता है? डाक्टर या इंजीनियर या वकील से ये क्षुद्र बुद्धि वाले क्यों नहीं कहते है कि इतनी बड़ी रक़म फीस में क्यों लेते हो? बाबुओं से क्यों नहीं कहते है कि इतना घूस मत लो.? बल्कि वहां पर तों सोचते है कि जितना जल्दी हो सके या बल्कि जो मांगता है उससे भी ज्यादा कुछ देकर काम करवा लो. फिर पंडितो के साथ ऐसा क्यों? किस आदमी ने यदि पंडितो के द्वारा प्रचारित-प्रसारित मान्यताओं को नहीं माना तों उसकी संपत्ति सरकार ने कुर्क कर ली है? किस पण्डित ने किसी को नोटिस भेजा है कि उसे उसे अमुक मान्यता का पालन नहीं करने पर दण्डित किया जाएगा? और निश्चित रूप से यदि आप स्वयं किसी ब्राह्मण को अनुबंधित कर रहे है तों फिर उसकी भी फीस देनी ही पड़ेगी. बनिया और तेली चाहे कितना भी मिलावटी सामान देगें, उनको दाम दिया जाएगा तों फिर ब्राह्मण को क्यों नहीं? इन बनिया तेलियो के मिलावटी सामान खाकर तों आदमी मर जाता है फिर भी लोग बनिया के ही यहाँ सामान खरीदने जाते है. किस ब्राह्मण ने किसी तेली या बनिया के श्राद्ध कर्म पर रोक लगाने का व्हिप जारी किया है.? पण्डित तों आज किराना क़ी भी दुकान खोले बैठे है. इन बनिया, तेली, कुम्हार, कलवार आदि को कौन मना किया है कि वे पौरोहित्य कर्म न करें? ह़र कोई महँगा सामान ही नहीं खरीदता है. जिसकी जितनी औकात होती है उसके मुताबिक वह सामान खरीदता है. जो पढ़े लिखे विशेषज्ञ पण्डित से अपना कोई कार्य करवाएगा उसे उसकी लम्बी चौड़ी फीस देनी ही पड़ेगी. और कम फीस देने पर तों वही हाईस्कूल फेल पुरोहित ही मिलेगा. रही बात मान्यताओं के पीछे के ठोस तर्क क़ी. तों क्या किसी ने पूछा है कि हे डाक्टर साहब आप जो टिकिया खाने को दे रहे है उसमें कौन कौन सी चीज मिली हुई है? या फिर क्या कोई उस डाक्टर से पूछता है कि किस तरह और क्यों आप क़ी यह टिकिया खाकर मैं रोग से छुटकारा मिल जाएगा? और बहुत से लोग यही टिकिया खाकर चटपट परलोक सिधार जाते है. किन्तु यह तों मान्यता है कि डाक्टर जो टिकिया दे या दवा दे उसे बिना पूछे खा लिया जाता है. उसमें कोई पूछने क़ी कोई बात नहीं है. किन्तु पण्डित से अवश्य ज़रूर पूछा जाएगा कि इस मान्यता को क्यों माना जाय? कारण यह है कि बाकी जो चोर, डकैत, लुच्चे, लफंगे, सूदखोर, मिलावट खोर, झूठी प्रशंसा क़ी ऊंची तालियों क़ी गडगड़ाहट से खुशी से झूमने वाले सरकार से ऐसा करने का "लाइसेन्स" लिये है. विपरीत इसके पंडितो के पास ऐसा कोई "लाइसेन्स" नहीं है. संतोष जी, मैंने ब्राह्मणों को ही कहा है कि वे अपनी मौलिक एवं स्वाभाविक क्रिया कलाप एवं विद्या बुद्धि को विकसित करें. उसमें निखार लायें. ऊंची पढ़ाई करें. ऐसे विरोधी स्वयं हवा में तिनके क़ी भांति उड़ जायेगें.

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

श्रद्धेय विद्वजनों ,..सादर प्रणाम आपका आक्रोशित होना उचित है किन्तु सिक्के के दोनों पहलू हैं जिनको देखना जरूरी है ,.मूरख ने पूर्व में कहा है की बुराई दहेज़ में है सात फेरों में नहीं !!!....भारतीय संस्कृति में ब्राम्हण को ज्ञान का वाहक है ,जो सर्वश्रेष्ठ कर्म है वर्तमान समय में भी जितना सम्मान ब्राम्हणों का है वो अतुलनीय है ,यह सम्मान बनाये रखने और दृढ करने में ब्राम्हणों को ही आगे आकर काम करना होगा ,..लालच मानव सुलभ है इसे किसी जाती विशेष से जोड़ना भी उचित नहीं है ,.. ताकत मिलने पर ही उसका दुरूपयोग होता है , निश्चित ही पूर्व में ब्राम्हणों ने भी एसा किया है और यही कारण है की आज इनका सम्मान घटा है ,...ब्राम्हण भोज को यदि मानव भोज में परिवर्तित किया जाय तो निश्चित ही ज्यादा बेहतर होगा ..और सदा यही होता आया है की ब्राम्हणों के भोजनोपरांत सब भोजन करते हैं ..यह यदि साथ हो तो निश्चत ही समरसता बढ़ेगी . पांडित्य विद्या से आता है इसे जन्म सुलभ बनाना उचित नहीं है ,..आजकल देखता हूँ की ग्रामीण अंचलों में दसवीं फेल पंडित जिनको संस्कृत का शुद्ध उच्चारण नहीं आता है वो भी पंडिताई करते हैं ,यह अनुचित है ,...समझता हूँ की परम्परानुसार काम होना चाहिए और परिवर्तित समाज में सभी को पंडिताई करने का अधिकार मिलना चाहिए यदि वह उन मानदंडों को पूरा करता है ,..यह विद्या ,विवेक और आचरण से निश्चित हो ,..गुरुकुलीय परंपरा में शिक्षा प्राप्त कर सभी एसा कर सकते हैं ,निर्धारित परीक्षा भी होनी चाहए ,... समाज को बहुत परिवर्तन देखना है हमें लचीलापन रखते हुए भारतीय परंपरा को आगे स्वच्छता से बढाने में सहयोगी बनना चाहिए ,..जो योग्य होगा उसे सम्मान ही मिलेगा ,..कोई बात अनुचित लगे और जरा भी कष्ट हो तो ह्रदय से क्षमा प्रार्थी हूँ ...सादर आभार सहित

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

भारती जी, विरोधियो का काम है विरोध करना. आप ही बताएं, पण्डित लोग यदि किसी सामाजिक मान्यता के अनुरूप कार्य करने को कहते है तों उन्हें धमकी दी जाती है कि अब जनता जागरूक हो गयी है. अब लोग आँख बद कर पंडितो का घर अपनी संपदा से नहीं भरेगें. किन्तु बनिया-बेकार, तेली-कुम्हार, कोल-कलवार आदि आदि ठग कर अपना घर भरते है तों किसी को कोई आपत्ति नहीं है. आटे में चूना और मिर्च पावडर में ईंट का चूरन मिलाकर बेचने वाले बनिया को कोई नहीं कहता कि दुकान पर मत जाओ. सीधे कंपनी से माल खरीदो. तेली को कोई नहीं कहता कि तुम सरसों के तेल में तीसी का तेल मिलाकर क्यों बेचते हो? डाक्टर को कोई नहीं कहता कि तुम दवा के नाम पर क्यों ठगते हो? क्योकि ये लोग हड़ताल कर देगें. और इनसे मिलने वाला "रेवेन्यू" बन्द हो जाएगा. किन्तु ब्राह्मण क्या करेगा? उसके पास कौन सा पुलिस या कानून का बल है जो अपनी मान्यता का विरोध होने पर "रेवेन्यू लास" क़ी धमकी देगा? फिर एक मात्र ब्राह्मण सनुदाय पर ही ऊंगली क्यों उठाना?

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

आदरणीय प्रकाश चन्द्र पाठक जी सादर प्रणाम सबसे पहले तो मैं आपसे इतना ही कहना चाहता हूँ कि मैं आपके विचारों का समर्थक हूँ| आपके इस लेख को भी मेरा सौ प्रतिशत समर्थन है| मैं आपकी रचनाएँ पढता हूँ लेकिन कमेन्ट देने कि हिम्मत अब नहीं होती क्योंकि एक बार आपके एक लेख पर मैंने कमेन्ट दिया था तो आपने जवाब थोड़ी व्यंगपूर्ण वाणी में देते हुए मुझे अपने अल्पज्ञान का दिखावा न करने की सलाह दी थी जो मेरे दिल पर थोड़ी सी लग गई| बावजूद इसके मैं आपके लेखों को पढता हूँ, क्योंकि आपके लेखों में मुझे अपने विचार नजर आते हैं| इस लेख पर मैं खुद को कमेन्ट देने से रोक नहीं पाया क्योंकि ये लेख मुझे काफी अच्छा लगा| अगर आपको मेरी ये प्रतिक्रिया भी पसंद न आये तो कृपया इसे मिटा दीजियेगा, पुनः कटु वचनों का प्रयोग मत कीजियेगा| (मेरी ये प्रतिक्रिया आपकी रचना "आधुनिका नारी :- समाज का कोढ़" के लिए है| वहां कमेन्ट क्लोज बता रहा था इसलिए यहाँ दे रहा हूँ)

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

आदरणीय पाण्डेय जी अब क्या भारत बंद होगा? इसे तो जब खोला गया तभी इसके दरवाजे, किवाड़, फाटक, चौखट सब उखाड़ दिए गए. जब कुछ है ही नहीं तो यह बंद कहाँ से होगा? मुझे नहीं मालूम आप कहाँ के ब्रह्मण है तथा आप के पास कौन सा ताड़पत्र है, भोजपत्र है या प्रमाण पत्र है. किन्तु इतना अवश्य कहूंगा क़ि प्रत्येक जलधारा गंगाधारा नहीं होती है. कम से कम पढ़ लिए होते क़ि जिन शब्दों को जहां प्रयुक्त किया गया है वह किसके लिए हुआ है. जिस औरत के लिए वे शब्द प्रयुक्त हुए प्रतीत होते है उसने खुद ही इसे गलती मानते हुए महसूस कर लिया है. क़ि भ्रमवश वह इसे नहीं समझ पायी है. कृपया उसकी प्रतिक्रया देखें. "चलिए मान लेते हैं की मुझे धोखा हुआ और मैंने वो कमेन्ट लिखा" क्या सब औरतों ने मेरे शब्दों को इसी रूप में ग्रहण किया है? क्या अपने प्रतिनिधि के रूप में एक की ही जुबां से सबने अपना मंतव्य प्रकट कर दिया है? पता नहीं. वैसे उच्च स्तरीय संस्थागत अध्ययन, प्रतिष्ठा एवं मान मर्यादा का दंभ भरने वाली तथा कथित सभ्य आधुनिका महिलाओं के लिए, जो ग्रामीण परिवेश में पली, अनपढ़ किन्तु भोली एवं अपनी मर्यादा तथा शील के प्रति सचेत तथा साथ ही साथ आचार, व्यवहार, नारी सुलभ लज्जा के पवित्र आवरण से सांगोपांग आवेष्टित, नारी समुदाय के पहचान स्वरुप अस्तित्व को अपनी इसी अमिट छाप से आज भी जीवित रखने वाली स्त्री को अपरिपक्व, जाहिल, गंवार एवं ढपोरशंख मानती है, उनके साथ जुड़ कर अपनी अस्मिता गंवाने के लिए नीच से नीच शब्द भी तैयार नहीं है. मै क्या नया शब्द सृजित कर प्रयुक्त करूंगा. वैसे द्रोणाचार्य ने भी युधिष्ठीर की पूरी बात नहीं सुनी. आधा अधूरा सुनने एवं न समझने के कारण ही द्रोणाचार्य को प्राण गंवाने पड़े थे- "अशत्थामा मरो नरो वा कुंजरो" बात छाप छोड़ने की है तो किस पर अपनी छाप छोडूं? काली कमली पर कोई दूसरा रंग चढ़ सकता है क्या? मुझे उम्मीद है आप मेरी कटुवाणी या भाषा पर नहीं बल्कि सच्चाई पर एक बार फिर नज़र दौडायेगें. पाठक

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

आदरणीय प्रकाश जी नमन आज भारत बंद का भी खासा असर दिख रहा है और यह गधा पुराण तो पहले ही पढ़ लिया था माना की आप उत्तराखंडी खानदानी पंडित हैं पर स्त्रियों के लिए अपमानजनक भाषा के प्रयोग करने का क्या औचित्य था पाठक जी क्या आप राजा महाराजा के ताम्रपत्र वाले उत्तराखंडी पुरोहित थे पूर्व में हमारे जो पूर्वज हैं वो ताम्रपत्र वाले उत्तराखंडी पुरोहित हैं क्या आपके पूर्वज ताम्रपत्र वाले हैं क्या खानदानी वोही होता है जिसके पूर्वजो के पास राजा महाराजा का ताम्रपत्र है अगर आप पंडित हैं तो अपने उत्तराखंडी खानदान की ऐसी छाप मत दिखाईये कहा भी गया है ऊँचे कुल का जनमिया जो करनी उच्च न होय सुबरन कलश सूरा भरा साधू निंदा सोय यहाँ इतना ही कहूँगा धन्यवाद

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

यही मेल किया है न आपने.... आदरणीया साधना जी, मुझे आप से ऐसी मूर्खता की उम्मीद नहीं थी. वैसे अभी भी उम्मीद नहीं है. लेकिन क्या आप इसी टुच्ची बुद्धि के सहारे लेखिकाओं की पंक्ति में शुमार होना चाहती है? भाव भेद एवं विधा का ज्ञान नहीं और उलटे औरत होने का नाजायज़ फ़ायदा उठाते हुए आपने अपने ही स्तर का मुझे भी मान लिया? साधना जी , मैं पंडित तो हूँ, किन्तु मेरे पास शाप नहीं है. अन्यथा आप जिस तरह की भूमिका अदा की है, उसके लिए ईश्वरीय कोप ही आप के लिए यथेष्ट है. क्या आप ने देखा "न खुदा ही मिला न विशाले सनम, न इधर के हुए न उधर के हुए" किसने लिखा है प्रतिक्रया में? किसने पूछा है की "बता तू गधा है या नहीं?" फिर "अपने गधे को गधी पहचान गयी" यही तो लिखा है मैंने उसके लिए? क्या आप ने अपनी प्रतिक्रया प्रत्युत्तर जो मैंने पृथक से उसी ब्लॉग में दिया है, उसे नहीं पढ़ा? साधना जी , मेरी कोई बेटी तो नहीं है. लेकिन आप अपने माता-पिता की बेटी बनना थोड़ा भी सीख लें तो संभवतः आप के लिए कल्याण कारी हो जाय. वैसे भगवान बेटी भले न दे लेकिन ऐसी बेटी तो कत्तई न दे. मै इस प्रतिक्रया को ब्लॉग में इस लिए नहीं दे रहा हूँ कि पता नहीं कितने लोग पढ़ेगें. साधना जी, यह मेरी आप को सीख या चेतावनी जो भी मान ले, देना चाहूंगा कि किसी भी ब्राह्मण से उसका धन, यश एवं आचार भले छीन लेना. लेकिन उसका क्रोध कभी न लेना. आप ही के लिए हित कर होगा. आप ने आज मेरे मन से बेटी , उसमें भी पढी लिखी बेटी का तो भूत ही उतार दिया. क्रोध से मेरा जी जला जा रहा है. यदि हो सके तो क्षमा मांग लेना. अधिक न लिखने की क्षमा के कारण यही पर समापन कर रहा हूँ. पाठक ब्राह्मन जी, मैं आपको एक बात बताना चाहती हूँ..... जब मैं कोई गलती करती हूँ तो मुझे किसी से भी क्षमा मांगने में कोई हिचक नहीं होती.... लेकिन मुझे यहाँ अपनी गलती समझ में नहीं आ रही है.... ब्राह्मण होने का जो उपदेश आप दे रहे हैं वो मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता क्योंकि मैं इंसान की क़द्र करती हूँ जाति धर्म की नहीं.... अहंकार से भरे हुए लोगो को मैं घास भी नहीं डालती..... चलिए मान लेते हैं की मुझे धोखा हुआ और मैंने वो कमेन्ट लिखा लेकिन आप ब्राह्मण होकर किसी के लिए भी ऐसी भाषा का प्रयोग कैसे कर सकते हैं.... और हाँ मुझे किसी भी श्रेणी में शामिल होने का कोई शौक नहीं है.....

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

आदरणीय हरी बोल, आपकी भाषा है सचमुच  ही बेडोल, मेरे एक  बात समझ  में आती है, बेवकूफ  को सारी दुनियाँ बेवकूफ  नजर आती है, मुझे इस  बात की है बहुत हताशा, आपकी इन्सानों की नहीं है भाषा, कभी आप गधों की बनकर भौंकते हैं, और कहीं कुत्तों की तरह रेंकतें हैं। अरे इंसान  बनकर आइये, कोई अपना अच्छा सा ब्ल़ॉग  बनाइये, दैत्य कुल  की भाषा है तू और तेरा, क्या आपका दैत्यों में है बसेरा, आपसे किसने कह  दिया कि गधा बेवकूफ  होता है, गधा तो सीधा साधा नेक  बहुत खूब होता है, अरे उसका दोस्त जो भी हो डमी नहीं है, वैसे आप जैसे डमियों की कमी नहीं है,  अरे नाम  तो कृष्ण के भी थे अनेक, लेकिन वह थे तो एक, यह कोई नया नहीं है केश, ईश्वर ने भी बनाये थे कई भेष, यह लड़ाई  विचारों की है व्यक्तियों की नहीं, हमारी कमियों की है शक्तियों की नहीं, श्रीमान  शिष्ट भाषा का प्रयोग  करें, किसी पर अनावश्यक  रोक  न करे।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय श्री पाठक जी इतनी कड़वी सच्चाई गले के नीचे उतारना अत्यंत कठिन है. थोथी सामाजिक प्रतिष्ठा के लोभ एवं अपनी भोथरी लोकप्रियता को कौन बट्टा लगाना चाहेगा? अपने अति धारदार एवं नुकीले शब्द-वाण को थोड़ा कुंद कीजिये. विचार तों पसंद आया किन्तु भय के साथ ! लोकतंत्र में हमें ये छोट मिली हुई है की हम संविधान के दायरे में आने वाला कोई भी काम कर सकते हैं ! इसलिए बाबा जो कर रहे हैं वो कानून तो गलत नहीं लगता किन्तु हर बात की एक हद होती है और जब ये हद कोई पार करता है तो ये मन जाता है की वो न केवल सामाजिक बुरे फैला रहा है बल्कि वो संविधान की बातों से हटकर पैसा बना रहा है ! बाबाओं ने यही किया है , वो धर्म के नाम पर अन्धविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं और बाबा ही क्यों ? पोप और पादरी भी यही कर रहे हैं ! बढ़िया लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

आदरणीय प्रकाश जी सादर प्रणाम आपने जो भी लिखा उसकी प्रशंसा हेतु जितना भी कहा जाये कम है, अतः इस लेख के बारे में यही कहना चाहूँगा की - चिंतन की गहराइयों में उतर के सत्य के मोती लाये हैं आप. महोदय जितना मैंने इस विषय पर थोडा-बहुत मनन किया है तो उससे मुझे यही प्रतीत होता है की मनुष्य अपने षटरिपुओं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर के द्वारा जब प्रताड़ित होता है तो वो मानसिक रूप से अति व्याकुल एवं व्यग्र हो उठता है. यही व्यग्रता उसके अन्दर एक निराशा/हताशा उत्पन्न करती है. तत्पश्चात इसी मनोदशा के वशीभूत हो कर वो अनर्गल प्रलाप प्रारंभ कर देता है जो 'ईश्वर' जैसे सनातन तथा अविनाशी तथ्य को नकारने के निष्फल प्रयत्न के रूप में सामने आता है. (आपको अपने ब्लॉग से जोड़ के मुझे अति प्रसन्नता होगी)

के द्वारा: कुमार गौरव कुमार गौरव

आदरणीय प्रकाश जी ,.सादर प्रणाम आप सचमुच प्रकाशरूप हैं ,.(कभी कभी ज्यादा प्रकाश में आँखे चुंधिया भीजाती हैं -यह बात हास्य में ही कह रहा हूँ ) ...आपके पूर्ण लेख पर क्या लिख सकता हूँ फिर भी मूरख को भी लिखना चाहिए अतः लिख रहा हूँ , .. आपकी बात सर्वथा उचित है ,यदि हम सफल होते हैं तो "मैं ".. असफलता पर ईश्वर की याद आती है ...हम अपनी मूर्खता /कमजोरी से लाचार होते हैं, सुधारकर आगे बढ़ना ही मानव जीवन का लक्ष्य मानता हूँ ... एक जगह पहले भी लिखा था की एक तरफ राम (सत्य) किनारा है दूसरी तरफ रावण (असत्य ) है हम सब इसके बीच में तैरते डूबते जीवन धार में बहते रहते हैं ,..जिसने सत्य से दूरी बनाली वो ....राक्षस (जो शब्द आजकल के हुक्मरानों के लिए मैं ज्यादा इस्तेमाल करता हूँ ) जो सत्य के करीब आता गया वो संतत्व के निकट .... तमाम धर्मग्रंथों में ईश्वर और उनके दूतों/देवताओं के साक्षात दर्शन के अनगिनत वृत्तान्त हैं ,....मैंने भी ईश्वर को देखा है !..यह बात पूरी प्रमाणिकता से कह सकता हूँ लेकिन प्रमाण नहीं दे सकता हूँ ,.. उनसे वादा भी किया था जो अक्षरशः पूरा नहीं कर पाया ,.लेकिन मानता हूँ की उनके प्रति मेरी पुत्रवत भावनाएं सदा ईश्वर के करीब रखेंगी ,.और सबसे बड़ी मांग भी मेरी यही थी की कभी दूर मत होने देना ... ईश्वर अनेकों रूप में हैं और हमेशा रहेंगे ,ईश्वर को लाभदायक व्यापार बनाने वाले अपराधी हैं....मानता हूँ की किसी भी स्वरुप के दर्शन ,मनन ,सुमिरन,पूजा पाठ,सेवा आदि से आत्म संतुष्टि मिलती है तो हमारे अन्दर भी ईश्वर निश्चित रूप से हैं ...हम मानव जब साक्षात प्रभु श्री राम और माता सीता की परीक्षा का दुह्साहस कर सकते हैं ,.शांत शिरोमणि गोस्वामी जी को अपमानित कर सकते हैं तो समर्थन और विरोध होता ही रहेगा ,...अपनी सच्ची भावनाओ और ईश्वर के अथाह प्रेम को अपने साथ लेकर सबको जीता जा सकता है ,.जो कमियां होती हैं वो अपनी ही गलतिओं का परिणाम हैं ,..उनको परिष्कृत करते रहना होगा ,.ये कलिकाल है चारों तरफ से सत-तत्व दबाया जाता है ,.अन्दर के असत तत्व भी कम ताकतवर नहीं होते जो बाह्य कारकों से उत्पन्न विचलन के द्वारा और ज्यादा प्रभावी हो जाते हैं ,.. अंत में आपकी ही बात को पुनः लिखना चाहूँगा .. ईश्वर को देखने के लिये प्रेम, स्नेह, ममता, समर्पण, त्याग, सद्भाव. सदाचार एवं सद्धर्म का सूक्ष्म दर्शी लगाओ. ईश्वर से सान्निध्य पाओ. सुखी रहो,. आपको पुनः प्रणाम ,. गुरुदेव के चरणों में कोटिशः वंदन ..

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

श्रीमान सारस्वत जी, मैं पण्डित आर. के. राय को अपना गुरु मानता हूँ. और उन्होंने जो कुछ एक नाम गिनाये, उनमें आप का भी नाम आता है. अब आप कहते है कि यह गंभीर विषय है और आप इस पर कुछ कहना नहीं चाहते, तों या तों आप मुझे टाल रहे है या फिर आप कुछ ऐसा कहना चाह रहे है जो मुझे कड़वी लगेगी. कोई बात नहीं, आप का विचार. किन्तु आप अपने इर्द गिर्द, पड़ोस या समाचार पत्र आदि से तों इस विषय से सम्बंधित छोटी मोटी घटनाओं से रूबरू अवश्य होते होगें. तों सिर्फ आप उस पर विचार कर के निर्णय लीजिये. भले कुछ मत कहिये या लिखिए. रही आप के दूना मंदिर वाले लेख को पढ़ने क़ी, तों महानुभाव, मै उसे पढ़ चुका हूँ. पढ़ ही नहीं बल्कि प्रत्यक्ष देख भी चुका हूँ. आप को ज्ञात होना चाहिए कि जिनका भी नाम गुरूजी ने गिनाया है, उनकी रचनाएँ मै खोज कर पढ़ता हूँ. रही बात लेखो के फीचर्ड होने क़ी, तों श्री सारस्वत जी, आप स्वयं देखें, क्या मेरे लेख कभी फीचर्ड हो सकते है? कारण यह है कि ज्वलंत मुद्दे तों बहुत लोग उठा रहे है, किन्तु मुद्दे को ज्वलंत रूप से कितने लोग उठाये है, इसे आप निः स्पृह भाव से सोचियेगा. आप क़ी शुभ कामनाओं के प्रति आभार

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

प्रकाश जी नमस्कार आपने बहुत बढ़िया विवेचक हैं और आपने इस आलेख में जो सवाल उठाये हैं वह सही हैं पर प्रकाश जी आप यह मत सोचिये की कैसे लिखे इतने ब्लोग्गेर्स हैं आप अवश्य आगे बढ़ेंगे आप अच्छा लेख लिखते हैं मेरी भी जागरण मंच में लेखन यात्रा एक प्रतियोगिता से शुरू हुयी मेने दो ब्लॉग उसमे लिखे प्रतिक्रिया वाले कालम में चुनाव में प्रासंगिक और ज्वलंत मुद्दे और संभावित मुख्यमंत्री अलग अलग राज्यों के सन्दर्भ में फिर प्रतिक्रियाएँ उसमे भी मिली पर दो ही मेरा चयन नहीं हुआ फिर मेने अपना ब्लॉग बनाया उसमे अनिल कुमार अलीन जी और दिनेश आस्तिक जी ने समर्थन दिया उनके समर्थन के बाद मेरे बहुत मित्र बने और अब में भी आगे बढ़ रहा हूँ और शिखर पर हूँ मेरी चार पोस्ट इस मंच में featured हुई में उत्तराखंड का हूँ और वर्त्तमान में दिल्ली रहता हूँ अपने पिताजी की नौकरी और अपनी पढाई के कारण आप अवश्य आगे बढ़ें येही कामना है और आपके विचारों को मेरा समर्थन कृपया मेरे एक आलेख उत्तराखंड के जिला अल्मोरा का दर्शनीय मंदिर दूनागिरी अवश्य देखिये धन्यवाद

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

उस एक सुधार क़ी क्या उपयोगिता जिससे अनेक अन्य व्याधियां एवं कुकृत्य जन्म लें? एक वयस्क विवाह के चलते सुखी, खुश एवं संगठित समाज क़ी चूलें हिल गयी. जिसमें मामा, मौसी, चाचा-चाची, सगे-संबंधी, भाई-बहन एवं माता-पिता क़ी आवश्यकता होती थी. आज सिर्फ "प्यारे एवं प्यारी" या अंग्रेजी में "डीयर & डार्लिंग" क़ी आवश्यकता है. शेष जाएँ भाड़ में. जिस मीठे प्यार भरे रिस्तो के सहारे समाज क़ी बेल अच्छी खासी परवान चढ़ती हुई फल फूल रही थी, इन पढ़े लिखे समझदार वयस्कों को स्वतन्त्रता या दूसरे शब्दों में स्वच्छंदता प्रदान कर समाज सुधारको ने इस बेल क़ी जड़ ही काट दी. और ये वयस्क विषय वासना क़ी भूकंप भरे चक्रवात में प्रमादी बने यह भूल जाते है कि उनकी भी संताने होगीं जो उनसे ऐसे ही व्यवहार क़ी अपेक्षा करेगी. यदि मेरा आग्रह स्वीकार्य हो तों इस विषय पर एक बार और सोचें, अन्यथा मै तों अरण्य रोदन कर ही रहा हूँ. प्रकाश

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

श्रीमान, मत डरें उपहास से यह सीखने में पठार है. विकाश और उन्नति के मारग में यह इक कुठार है. ज्ञान क़ी सीमा नहीं जो इसको कोई बाँध ले. है नहीं हिम्मत किसी में पुरा इसको साध ले. शस्त्र तों पढ़ा है मैंने पर यह अर्थ का शास्त्र है आज के युग में यही बस सारे अनर्थो का शास्त्र है. आप का उत्तर मै देता पर आप स्वयं ही उत्तर दे दिये. मुझे कहे आगे बढ़ो और आप राहें घेर दिये. आदमी नित प्रति ही सीखता रहता है जीवन पर्यंत. पर आप ने वयस्क विवाह तक ही इसका कर दिया अंत. क्योकि इसकी स्थापना सब से अंत में हुई है, आप ने कहा. आप ने भविष्य वाणी ही कर दी अब शेष क्या रहा? वयस्क विवाह से सारी वैवाहिक कुरीतियों का समापन ही कर दिया. अब आगे कोई परिवर्तन नहीं होगा इसका आप ने सत्यापन ही कर दिया. पर बाल विवाह क़ी नीतियाँ शारीरिक पीड़ा तक ही सीमित है.. प्रौढ़ता क़ी पीड़ा तों देह, नेह, नैतिकता एवं धर्म के निमित्त है. समाज का गिरता पैमाना जो नैतिकता, धर्म एवं सम्बन्ध पर टिका है सदा. मनु, याज्ञवल्क्य, गार्गी आदि भारतीय दार्शनिको को भी पढ़ें यदा कदा. प्रेम ही विवाह का आवश्यक आधार है, तों मातृत्व, भ्रातृत्व, पितृत्व, गुरुत्वादी क्या बिना प्रेम के ही है? और भी क्या प्रेम नहीं करते जैसे मित्रादि. तों फिर विवाह के ही बंधन का प्रतिबन्ध क्यों? मात्र प्रेम के लिये. क्यों एक ही खूंटे से बंधकर उसी के इर्द गिर्द घूमना सदा के लिये? समाज तों स्वतन्त्रता देता है नित नए प्रयोग एवं परिक्षण करने के लिये. जो वयस्क ही कर सकते है, समझदार पढ़े लिखे है स्वतंत्र निर्णय के लिये. और फिर एक ही के साथ प्रेम शेष के साथ शत्रुता क्यों? सबसे विवाह करो, क्योकि सब से प्रेम है, एक ही के साथ मित्रता क्यों? प्रेम के अलावा समाज सुधारक न्यायालय ने क्या आधार बनाया है? उसने तों समाज, रीति, धर्म, नैतिकता, बंधन सबको धता बताया है. यदि प्रेम आधार नहीं तों क्या संतानोत्पादन विवाह का कारक है? तों संतान तों बिना विवाह के भी पैदा हो सकती है, चाहे औरस है या परदारक है. और यदि यह सब नहीं है तों विवाह के पीछे और क्या मनसा हो सकती है? फिर जैसा कि आप ने कहा है, धर्म, व्यवस्थित समाज, नैतिकता स्थापित हो सकती है. बाल विवाह से किस धर्म को पहुंचा था आघात? बाल विवाह से किस नैतिकता का हुआ था व्यतिपात? बाल विवाह से कौन सा समाज हुआ चकनाचूर या मटियामेट? प्रौढ़ विवाह के जिस कोढ़ ने जिसे न चढ़ाया बलिवेदी पर भेंट? प्रौढ़ विवाह ने धर्म के रूप को ही बिगाड़ दिया. इश्क, व्यसन, इन्द्रिय जनित भूख के कब्र में सारे अनुभवियो को गाड़ दिया. वयस्क विवाह क़ी आड़ में सिवाय इन्द्रिय जनित सुख के अलावा किस और विषय पर कौन बात करने को है उन्मुख? धर्म के इक अँग रूप में प्रेम सदा करता निज कर्म. प्रेम न्याय सत, हीन काम मद द्वेष रहित होता है धर्म. यदि अकेले प्रेम है परे हमारे किसी व्याख्यान से. तों धर्म कैसे हो सकता है परिभाषित किसी उपाख्यान से? आप स्वयं बताएं हमें वस्त्र क़ी आवश्यकता क्यों है? शरीर ढकने के अलावा इसकी अभिरुचिता क्यों है? किन्तु आज का वस्त्र शरीर के अँग पर पर्दा नहीं.चढ़ाता है. बल्कि जो अँग ढका है उसे भी निखार कर दिखाता है. आखिर इस अँग प्रदर्शन के पीछे मानसिकता क्या हो सकती है? अब आप निर्णय लें कि प्रौढ़ता क्या पा सकती है और क्या खो सकती है. शायद इसे भी धर्म, नैतिकता, आदर्श एवं विकास का प्रतिरूप कहा जा सकता है. और समाज सुधार के नाम पर इसे भी सहा जा सकता है. तों मै निरुत्तर हूँ कुछ भी कहने को इससे आगे. ऐसे समाज से शायद ईश्वर का भी भाग जागे. ---------------------------------------------- मुझे नहीं मालूम मैं अपने लेख से किसी का करता हूँ मार्ग दर्शन. जो भाव, विचार मेरे मन में है, बस उसी का करता हूँ प्रत्यर्पन =============प्रकाश============.

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

मान्यवर,  ऐसी ही सवाल  उठते थे, बचपन में मेरे मन  में, पूछता था परिजनों से करा देते थे चुप, अच्छे बच्चे ऐसी बात नहीं कर थे। अच्छे बच्चे बनने का चाहत  कर देती थी प्रतिबंधित, ऐसे प्रश्न पूछने के लिये, किन्तु पूर्णतया अच्छा बच्चा नहीं बन पाया आज  तक, क्योंकि प्रश्न उठ रहे हैं स्वतः ही मन में, माँग  रहें हैं अपना जबाब, कुछ  का उत्तर तो खोजने में रहा कामयाब, किन्तु  अधिकांश  आज  भी हैं अनुत्तरित. प्राचीन भारत  में विवाह की महत्ता को नकाने वाले मत भी चले, वाममार्गी भी था उन्हीं में से एक,  जो हो गया कालकलवित अपने दोषों के कारण, और भी हुये होंगे अनेकों प्रयोग, किन्तु अंत  में स्थापित  हुआ   केवल  वयस्क  विवाह, मनुष्य स्वतंत्र  जन्म लेता है,  मगर जन्म लेते ही सामाजिक  बेड़ियों से जकड़ जाता है, न्यायालय  का आदेश  विवाह के प्रेम  एक  आवश्यक  आधार, सही है। उसका अर्थ  यह कदापि नहीं है कि प्रेम  के लिये विवाह  जरूरी है, क्योंकि प्रेम  तो बहुत  विस्तृत  है ईश्वर की तरह, उसे शब्दों में परिभाषित  करना मेरे लिये तो असंभव है, चूँकि मुझे समाजशास्त्र  का नहीं है अधिक  ज्ञान, जितनी समझ  है, उसी आधार पर कह सकता हूँ कि वयस्क  विवाह जरूरी होने के कारण  है निम्नलिखत- नैतिकता, धर्म  की स्थापना, हेगेल  का द्वंदवाद का सिद्धांत, व्यवस्थित  समाज  की स्थापना का उद्देश्य, डर्बिन  का विकासवाद का सिद्धांत, संबंधों में स्थायित्व की कामना, और भी ऐसे अनेक  होंगे कारण  जिसका मुझे नहीं है ज्ञान, माँ एवं बेटे में शारीरिक  संबंध  की मान्यता, किसी भी धर्म  या समाज  में नहीं है स्वीकार्य, कुछ  वरषों पहिले आई थी ऐसी खबर, एक  महिला ने अपने बीस  वर्षीय  पुत्र से बनाया था शारीरिक  संबंध, उसे हुई थी लगभग  बीस  वर्ष  की सजा। मेरा अल्प  ज्ञान बस  इतनी ही इजाजत  देता है मुझे, आपका बहु ज्ञान  निश्चित  करेगा मेरा मार्गदर्शन, इसी उद्देश्य दे रहा हूँ प्रतिक्रिया, मेरी अल्पज्ञान का आप नहीं उड़ायेगें उपहास, इसी उम्मीद के साथ --दिनेशास्तिक।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

सादर! जब आप खुद ही बोल दिए हैं कि आप एक सार्थक और समयोचित विषय उठा रहे है तो मैं कुछ इस पर कहना नहीं चाहूँगा. क्योंकि आपके हरेक विचार में पता हूँ कि आप स्वयं अपने विचारों का समर्थन भी करते हैं और कटते भी हैं. बस एक प्रश्न रखना चाहूँगा कि आशा करूँगा कि आप baton को घुमा फिराकर कहने की बजे एक पंक्ति में उसका जवाब देंगे....आप एक तरह बात कर रहे है....... क्या मानवीय प्रतिबन्ध प्राकृतिक गतिविधि को प्रतिबंधित कर सकता हैं............भी सोचे. और दूसरी तरफ रिशते और नातों की दुहाई देकर प्राकृतिक गतिविधियों को रोकना भी चाह रहे हैं.....हाँ यह पर मेरा कोई अपना विचार नहीं है और न ही मैं आपकी बात को तोड़-मदोकर रखा हूँ और न ही काटने की कोशिश कर रहा हूँ. मैं बस वह रखा हूँ जो आप यहाँ प्रस्तुत किये हैं. कृपया समाधान करें........

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

प्रकाश जी सादर नमस्कार, आपका परिचय वाला ब्लॉग पढ़कर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई थी, मुझे खुद पर शर्म महसूस हुई थी कि देखो आपने किस तरह लेखन के पहले अपना परिचय दिया है. मैंने तो यह नहीं किया था.इसीलिए शायद आजतक अन्य ब्लोगर्स मुझे कभी अक्रक्ताले या फिर कुछ और अजीब से नामो से संबोधित करते हैं. किन्तु पुनः जब आपके ब्लॉग पर आया तो देखा आप किसी का तकनिकी त्रुटी के कारण ब्लॉग ठीक से प्रकाशित ना होने पर उसका उपहास कर रहे हैं. भाई तकनिकी त्रुटी से कभी कभी परेशानी आती है कई ब्लोगर जो मेरी या मुझेसे भी अधिक उम्र के है वे कम्प्यूटर पर इतनी अच्छी तरह कार्य नहीं कर पाते जैसे आज के युवा इसीलिए कई बार गलतीयां हो जाती हैं. उसका उपहास करना क्या रुचता है? हम यहाँ अच्छा लिखने और अच्छी बातें पढने आये हैं. व्यर्थ पर ध्यान देकर क्या करना है? आपके उदाहरणों से मुझे आपकी क्षमता का एहसास हो रहा है आप बहुत अच्छा लिख सकते हैं. आपके आलेख पढ़ना हम सभी ब्लोगर के लिए यह बहुत ख़ुशी कि बात होगी. किन्तु आप यदि ऐसे ही श्वान वाले उदाहरण पेश करेंगे तो हम क्या कहेंगे. भाई गाँव में श्व्वान आता है तो सार श्वान जानते हैं कि वह गाँव में आकर क्या करेगा. इसीलिए उस पर भौकते हैं. किन्तु क्या किसी संत का ऐसा स्वागत होते आपने देखा है. संत जब नगर प्रवेश करता है तो उसका स्वागत भी होता है उसके रुकने कि भी व्यवस्था होती है क्योंकि सब जानते हैं कि वह संत उनको कुछ ज्ञान देकर ही जाएगा. बस आपसे भी मुझे एक संत कि भाँती आचरण रखने कि उम्मीद है. आगे इश्वर मर्जी. जय श्री राधे.

के द्वारा: akraktale akraktale

प्रकाश ji ,.सादर नमस्कार आप विद्वान हैं,अच्छा लिखते हैं ... लेकिन पीड़ा का इतनी जल्दी प्रक्तावा अनुचित है ,.अभी आपने पहला ब्लाग लिखा ,.जागरण एक आलोकित दर्पण और इतनी जल्दी निराश भी हो गए ,..थोडा समय दीजिये आप अच्छा लिखते हैं अवश्य ही आगे बढ़ेंगे ,. यह एक सार्वजनिक मंच है जहाँ सभी एक दुसरे से विचारों के माध्यम से जुड़ते हैं ,..और कोई पढने या प्रतिक्रिया के लिए बाध्य नहीं है ,..मंच के अनुभवी संपादक अच्छी रचनाओ को चुनकर फीचर करते हैं ,टाप ब्लॉग में स्थान देते हैं और अच्छे अंशों को अखबार में भी जगह मिलती है ,.शेष मित्रो की बातों को आप उचित सन्दर्भ में लीजिये ..रचनाओ के माध्यम से स्वस्थ विचारों के आदान प्रदान से बुराई को नियंत्रित करना ही हम सबका उद्देश्य है ...सादर आभार

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

श्री आस्तिक जी महानुभाव हेगेल के आवास में कोई लिफ्ट भी था, इसका मुझे ज्ञान नहीं है मुर्गी पहले हुई या अंडा पहले हुआ इसका मुझे भान नहीं है. बिना विचारक के भी विचार जन्म लेता है क्या? विचार शून्य कभी विचार देता है क्या? पहले विचार फिर व्यक्ति या पहले व्यक्ति फिर विचार शब्द जाल क़ी विद्रूपता का यह है व्यभिचार बिना लिखे कोई चीज पढी नहीं जाती बिना विषय के परिभाषा गढ़ी नहीं जाती. यहाँ और भी कोई उठे वैचारिक विवाद उससे पहले पढ़िए कृपया लैमार्क का विकाशवाद. पूर्व काल क़ी घटनाएँ शिक्षा लेने के लिये है तुलना करने के लिये नहीं. हेगेल क़ी सीढ़ी चढ़ने के लिये थी किसी को "लिफ्ट" करने के लिये नहीं.---------------------- सोना यदि होगा तों निश्चित ही चमकेगा. सोना कह देने से खोटा सिक्का कभी नहीं दमकेगा. मुझे तों ऐसा ही लगता है, और शायद लोग भी ऐसा ही कहते है. अब डाक्टर हत्यारा है या नहीं ये तों वही लोग बेहतर जानते है. जो चाकू जिसके हाथ में है, हत्यारा उसी को मानते है. कागज़ के फूल से खुशबू कभी नहीं आयेगा जब तक वह किसी फूल से खुशबू नहीं चुराएगा. और समाज सुधारक कहेगें खुशबू तों खुशबू ही है चाहे चोरी क़ी हो या जन्म जात और समाज सुधारक तों हम कहलायेगें ही चाहे दुष्कर्म करें दिन रात चहरे एवं विचार के चक्कर में बुराई छूट गयी हम सच है, बाकी झूठ बस भलाई लुट गयी. बुरा को बुरा मत कहो, मानसिकता को दोषी मत ठहराओ यही बात ज़रा अपने शिष्यों के मर्मस्थल तक पहुँचाओ. जिन्हें कहने एवं करने का अंतर तक ज्ञात नहीं. डफली पीटने से बनती कोई बात नहीं. जिन्होंने समाज सुधर का सिर्फ जूमला ही रट अखा है. और इसका ठेका सिर्फ अपने में समेट रखा है. ज़माने ने कुछ नहीं बदला अपने आप में आज भी उसके वही अंदाज़ है. सूरज, चाँद, धरती, आकाश, अम्बु, पवन जैसे पहले थे वैसे आज है, अपनी इच्छा के मुताबिक हम इसे सुरूप एवं बिद्रूप करते रहते है. अपनी कुत्सितता छिपाने के लिये "ज़माना बदल गया" यह कहते है. जब तक आधार नहीं लम्ब क़ी आशा एवं कल्पना कोरी कल्पना ही रह जायेगी. जब तक व्यक्ति का अस्तित्व नहीं विचार क़ी रचना कोरी कल्पना ही कहलायेगी. कोई विचार नहीं यदि व्यक्ति ही नहीं है. कोई सुधार नहीं जो स्वयं सुघर नहीं है. ..

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

आदरणीय  प्रकाश जी नमस्कार, धन्यवाद एवं आभार, विचार ही व्यक्ति है, वही उसकी शक्ति है, विचारों को परिभाषित  करने के लिये, पहले हेगेल का द्वंदवाद का सिद्धात जरूर पढ़े, फिर कोई परिभाषा गढ़ें, आदरणीय एक  बात साफ  है, यह लड़ाई समाज  की बुराईयों के साथ साथ  अपने भी खिलाफ  है, पहले हमें अपने आपको बदलना है,  फिर समाज  सुधार  की बात करना है, जमाना बहुत बदल गया है मित्र, बात जरूर लगती है विचित्र, अब तो ऊपर जाने के लिये लिफ्ट चल  गई, धीरे धीरे सीढियों की प्रथा बदल  गई, विचार के विकसित होने को विचार का बदलना नहीं कहते, हम  सब  विचार ही हैं, विचार नहीं रहता तो हम  नहीं रहते।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय प्रकाश जी सादर नमस्कार, धन्यवाद  एवं आभार, माना हर चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती, पर हर सोना चमकता है, क्या यह सच  है, या केवल  मुझे लगता है, भाई डॉक्टर वाला तर्क  तो हम  समझ  नहीं पाते, यदि डॉक्टर हत्यारा लगता या दिखता तो हम  उसके पास  क्यों जाते. आपने सूरज  और अंधकार के गोले का जो उदाहरण  चुना, मैंने तो आज  तक  ऐसा नहीं सुना, कोई अंधकार के गोले को सूरज  कहे, ऐसा सुनके तो अंधा भी चुप न रहे, बिना प्रमाणों के चोर भी चोर नहीं होता है, इसलिये वह अपने आपको साहूकार कहता है, मान्यवर, प्रकाश पुंज  भी कहीं न कहीं से उर्जी लेता है, मैं स्वयं प्रकाशित हो रहा हूँ ऐसा कहता है, वास्तविक  चेहरे हमारे विचार होते हैं, जो एक  नहीं हजार होते हैं, भाई अब तो खुश्बू वाले फूल  भी चल  गये, कभी न  मुरझायें ऐसे फूल  बाजार में भर गये, आप आये आपका स्वागत है आदरणीय प्रकाश, आप आओगे, मुझे पहिले से था आभास, आपके प्रथम  पोस्ट से ही द्दष्टिगत हुआ   था उद्देश्य, कोई अनुचित बात कही हो तो क्षमा माँगता है दिनेश।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

यदि फंसना नहीं होता तों इस बर्रे के छत्ते में हाथ ही क्यों डालता. अब हाथ ड़ाल दिया तों बर्रे तों काटेगी ही. क्योकि यह उसका स्वभाव है. जब व्यक्ति ही नहीं तों विचार कैसा? आधार नहीं तों लम्ब कैसा? व्यक्ति से व्यक्तित्व बनता है. तब किसी विचार का जन्म होता है. व्यक्तित्व या विचार के भेद बाद में बनते है. आप विचार है, व्यक्ति नहीं. इस अवधारणा के लिये आप निश्चित ही धन्यवाद के पात्र है. यह तों सोच का स्तर है कि शल्य चिकित्सा को भी क़त्ल का नाम दे दिया जाय? इसके लिये जिम्मेदार कौन? मुझे अपने आप को सही प्रमाणित करने क़ी आवश्यकता नहीं है. किन्तु जो गुमराह करे उसका अनुकरण तों मै नहीं ही कर सकता. जैसे कि जबरदस्ती यह कहना कि "मेरे विचारों (ब्लॉग) को अवश्य पढ़ें." सीढ़ी में कई पायदान होते है. एक एक सीढ़ी चढ़ने वाला ही अंतिम पाय दान पर पहुंचता है. छलांग लगाने वाला तों मुँह के बल गिरेगा ही. बुराई से लड़ने के लिये सम्बंधित संसाधनों क़ी आवश्यकता होती है. बिना पूर्व तैयारी के योद्धा पराजय का सामना करता है. बुराई के अनेक पहलुओ को अलग अलग करें. सब पर अलग अलग प्रहार करें. केवल बुराई कह देने से ही इस संगठित व्यापार का अंत मेरी समझ से नामुमकिन है. अब आप में क्या बुराई है तथा मेरे अन्दर क्या बुराई है, यदि आप चाहें तों इस पर विचार करते रहिएगा. मै व्यक्ति विशेष पर टिप्पड़ी तभी करूंगा जब वह अकेले ही अपने आप को प्रस्तुत करे. क्यों कई चहरे लगाना? जब विचार एक है तों चेहरा बदलने क़ी क्या आवश्यकता है? बार बार चेहरा बदलना या एक ही काम के लिये अनेक चेहरा लगाना असंगठित प्रयास है. एक विचार-एक चेहरा, संघे शक्ति कलौ युगे. यह मेरा नितांत व्यक्तिगत विचार है, किसी के सहमति या असहमति से मेरा कोई लेना देना नहीं. माई विश्वास करता हूँ कि जब शरीर के किसी अँग में अर्बुद या कैंसर हो जाय तों उसका इलाज़ ह़र संभव करना चाहिए. किन्तु यदि उस एक अँग से शरीर के अन्य अँग भी व्याधि ग्रस्त होने लगें तों उसे काट कर फेंक देना चाहिए, यह मेरा मानना है. यदि मै व्यक्ति विशेष का विरोध कर रहा हूँ तों इसी आधार पर. इसे चाहे आप मेरा घमंड कहें या कुछ और, यह आप क़ी समस्या है. आप को उलझा हुआ देख कर एक सज्जन को इतनी पीड़ा हुई कि उनके समझ दानी का दायरा ही सिकुड़ गया. तथा और तत्काल निर्णय ले लिये कि अर्द्ध मानसिकता वाले को क्या समझाया जाय? यह भी समाज सुधार का एक नया नुस्खा आप लोगो से सिखाने को मिला है कि समझ दार को समझाओ, जिसकी समझ में कमी है उसे न समझाओ. यह उस सज्जन के विशाल समझदानी क़ी समझ है. यह तों मुझे पता है कि कसी क़ी दुखती रग पर हाथ रखने से पीड़ा होती है. किन्तु पीड़ा जानने के लिये दुखती रग पर हाथ रखना आवश्यक है. अब आप इसे पीड़ा देना कहें या पीड़ा बांटना, यह आप के ऊपर निर्भर है. जंजाल अच्छा जाल नहीं अच्छा. ईश्वर सबको बुराई से नहीं बल्कि बुराईयों से दूर रखे.

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

मित्र, मजाक ही तो हो रहा है यह................ ये क्या कर रहे हो आप.............."बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले ना भीख" बिना मांगे सलाह सिर्फ उन्हें देनी चाहिए जो उसे समझ सकें........ कल पाठक जी............को मैंने यह लिखकर कहा था की...........आप लेखनी पर ध्यान दे इन जैसे कृत्यों को लेखनी नहीं कहते.............फिर उन्होंने आज वही काम किया.................आप देखो की अभी तक उनके चार लेख आयें है और चारो में या तो उन्होंने जे जे या अपने बाड़े में ही लिखा है.......इस पोस्ट का टाइटिल या इसके पहले पोस्ट का टाइटिल ..........दोनों अपने आप में मजाक सा लग रहा है............... मैंने उनको सलाह दी .............तो उन्होंने मुझे गुस्सा ना करने की सलाह दे डाली ................गुस्सा तो वैसे मुझे जल्दी आता नहीं........इसलिए मैंने बेकार के तर्कों से खुद को दूर किया और नजरंदाज किया इन सब बातो को...............अब यहाँ देख रहा हूँ की आप उल्जे हुएं है............इससे किस प्रकार सार्थक लेखन कहूँ यह सोच नहीं पा रहा .........इसी लिए आपकी बातों का समर्थन किया था ................पाठक जी नयें है .........और अपने स्टैंड पर खड़े है..............आपने एक बार समझा दिया अब आशा मत रखिये की वो समझ ही जायेंगे............ना समझे तो उनकी समाश्या है...........आप क्यूँ अपना टाइम खराब कर रहें है..............यह याद रहे बुरी मानसिकता को सुधारा जा सकता है...........किन्तु आधी मानसिकता को कभी नहीं.........यह मेरा विचार है.............यानी की जो जाग कर भी सोया है उसे क्या जगाएंगे आप............अब मेरे बात का कोई बतंगर ना बने यही दुआ करूंगा.............आपसे और पाठक जी दोनों से की इस बात को आगे ना बढाया जाए और यदि मेरी बातों से संतुष्टि ना हो पाठक जी को तो यह आपका ब्लॉग है............अवस्य इस कमेन्ट दो डिलीट कर दें .............धन्यवाद

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

अब आप स्वयं अपनी ही बातों में फसते गए, खुदब-खुद अपने विचारों को गलत ठहरा दिया ....... १. आपने यह माना है कि यदि मेरी जुबान आपकी होती तो दो पद्धतियों का जन्म नहीं हुआ होता. जबकि आप स्वयं अपने लेख में दो पद्धतियों को जन्म दिया है. २. मैंने कही भी यह नहीं दिखाया कि मैं सही हूँ बल्कि हम की बात किया हूँ और उसमे मैं भी हूँ और आप भी. यदि आप खुद को महान साबित करना चाहें यह अलग बात है. ३. आप डाक्टर और मरीज द्वारा जो बात रखनी चाही हैं, वह मेरी बातों को सिद्ध करता है न कि आपकी. पर डाक्टर कभी मरीज नहीं हो सकता, यह कहना उचित नहीं होगा. ४. मैं यहाँ कहीं भी अच्छाई को बुराई का नाम नहीं दिया हूँ बल्कि यह कहना चाहा हूँ कि हम हमेशा ही अच्छाई के नाम पर समाज में बुराई फैलाते आये हैं. यक़ीनन सूरज को सूरज कहा जायेगा. परन्तु अँधेरे को आप धुप नहीं कह सकते. यदि किसी व्यक्ति का क़त्ल हो रहा है तो आप यह नहीं कह सकते की जिन्दा हो रहा है. ५. मैं तो यह बोला ही नहीं कि मैं कोई व्यक्ति हूँ. मैं तो पहले ही बोल दिया हूँ कि एक विचार हूँ और विचार का कोई चेहरा नहीं हो सकता. ६. जिस आवाज बुलंदी और अपनी ढपली-अपना राग की बात कर रहे हैं. वही तो बात मैं कर रहा हूँ कि हम हमेशा ही अपने स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए व्यक्ति और समूह विशेष को दोषी ठहराते आये हैं और हम यही पर गलत हो जाते हैं. परन्तु आप अकेले हो जो खुद को सही साबित कर रहे हो. अब इसको क्या कहा जाय? ५. जहाँ तक आप चोर और साह का मुद्दा उठाये हैं तो यह बात सिद्ध करता है कि आप अपनी बात से पीछे हट रहें हैं. क्योंकि मैं यह कहा ही नहीं कि आप चोर हो या मैं चोर हूँ. पर यह जरुर कहा हूँ कि बुराई आपके पास भी है और मेरे पास भी हैं. जिसका दोनों जगह से विरोध होना चाहिए. ६. आपकी बातों से स्पष्ट होता है कि आप व्यक्ति का विरोध कर रहे हैं जबकि मैं गन्दी मानसिकता का विरोध कर रहा हूँ. ७. आपने एक बार फिर व्यक्ति पर टिप्पड़ी किया है और कई चेहरे की बात रखी है जबकि मैं एक विचार की बात किया हूँ जिसके कई चेहरे हैं. यदि आप कह रहे है कि आप जो बोल रहे है कि आपका विचार केवल आपका है तो यह आपका घमंड बोल रहा हैं. ८. मैं यक़ीनन कागज का फूल हूँ. पर मैं यहाँ आपके बारे में कुछ भी कहना नहीं चाहूँगा. और अंत में बस इतना ही कहना चाहूँगा कि मैं बुराई का विरोध करने आया हूँ और आगे भी करूँगा. वो चाहें आपके पास हो या मेरे पास..साथ ही यह ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि आप गुलाब की तरह मुस्कुराएँ और साथ ही इस फिजां में अपनी महक छोड़ते रहे............ और मित्र प्रवीन हर वक्त मजाक अच्छा नहीं लगता. यहाँ मेरे विचारों के समर्थन करने के बजाय यदि तुम सिर्फ बुराई का विरोध करते तो ज्यादा बेहतर होता क्योंकि आदमी कभी भी परफेक्ट नहीं हो सकता. यह भी हामी में से एक हैं कोई अलग नहीं हैं....हम सभी को साथ ही रहना है......

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

मान्यवर, मेरी जुबां मेरी है. आप क़ी जुबां आप क़ी. यदि मेरी जुबां आप क़ी होती तों शायद पद्धतियों का विभाजन-नकारात्मक-सकारात्मक का अवतार ही नहीं हुआ होता. रही बात नकारात्मक या सकारात्मक दिखने क़ी. तों मान्यवर दिखने से कुछ नहीं होता. चमकने वाली सारी वस्तुए सोना नहीं होती. आप चाहे जो भी दिखें, प्रस्तुति करण सकारात्मक होना चाहिए. आप अपने अन्दर नकारात्मक या सकारात्मक क्या छिपा कर बैठे है, इसका क्या पता? लोग तों जो आप प्रस्तुत करेगें, वही देखेगें. एक डाक्टर लोगो के शरीर को चीर फाड़ कर रख देता है. क्योकि शल्य चिकित्सा के लिये यह आवश्यक है. किन्तु उसे हत्यारा नहीं कहा जाता. कारण यह है कि डाक्टर दिखता हत्यारा है, लेकिन काम उसका जीवन देना है. रही बात अच्छाई को बुरा कहने क़ी. तों सूरज को बादलो से क्या डर? और जो बादलो से डरे वह सूरज कैसा? सूरज तों सूरज को हा कहा जाएगा. अब आप चाहे अन्धकार के गोले को सूरज कह कर संतोष करना चाहते है तों यह आप क़ी मर्जी. आगे, यदि कोई सजीव है तों उसके पास सोच एवं विचार होगा ही. आप अकेले नहीं , सब लोग मन मस्तिष्क से विचार रखते है. यह अलग बात है कि अपनी डफली अपना राग. रही बात आवाज बुलंद करने क़ी, तों चोर हो या साहूकार, अपराधी हो या निष्कलंक सब अपनी आवाजें बुलंद करते है. चोर भी अपने आप को चोर नहीं कहता. सबके सामने किसी क़ी ह्त्या करने वाला भी न्यायालय में अपने आप को बेक़सूर बताता है. किन्तु उस आवाज बुलंद करने का क्या फल? नक्कार खाने में तूती क़ी आवाज. और अंत में मान्यवर, प्रकाश पुंज जब स्वयं प्रकाशित होता है तभी वह औरो को भी आलोकित करता है.जब स्वयं ही अँधेरे से भरा हो तों वह दूसरे को क्या प्रकाश देगा? श्रीमान, मेरे पास अपना चेहरा है जो मेरा अपना है, हो सकता है आप के पास कई तरह के चहरे हो, जैसा कि आप ने कहा है, यह आप ने अच्छा किया जो स्वयं ही बता दिया. इसके लिये मै आप का आभारी हूँ. किसी के इस कथन के साथ- :खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलो से"

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

जी बहुत खूब, मैं आपकी बात आपकी जुबानी ही में करता हूँ . बिल्कुल आपने आपने सही कहा कि सकारात्मक पद्धति ही सही है. नकारात्मक पद्धति न कभी सही हुई है और न ही सही हो सकती है. परन्तु हमें इतनी समझ जरुर होना चाहिए कि नकारात्मक और सकारात्मक क्या है ? यदि हम खुद को सकारात्मक दिखकर नकारात्मक काम करते रहे, क्या यह सकारात्मक? जो कल से लेकर अबतक होता आया है. या फिर नकारात्मक को दिखाकर सकारात्मक काम करते रहें जो कुछ विशिष्ट महा पुरुष ही कर पायें जिनका उदहारण आप भी लिए हैं. यदि वह सही थे तो वह जानते थे कि गलत क्या है. इस लिए वह जीवन भर गलत का विरोध करते आयें और सही का अनुकरण करते आये.........उन्होंने तो हमेश ही अनुकरणीय पथ प्रदर्शि किया पर क्या हम उसका अनुकरण कर पायें . नहीं बल्कि उन्ही के नाम पर हम वो करते आये जिसका वो विरोध किये.....आप अच्छाई की बात कर रहे है और व्यक्ति को दोषी ठहरा रहे है...दोनों ही विपरीत बाते है और यहाँ कोई बुराई की बात कर रहा है और मानसिकता को दोषी ठहरा रहा........अब यह क्या है. आइये कुछ देर बैठते है और इस चिंतन करते है और फिर बाते करते हैं....हाँ जाते-जाते एक बात और आप किसी भी प्रकार के गलत फहमी में मत रहिएगा कि मैं कोई बाबा या समाज सुधारक हूँ, मैं स्वयं सुधारक हूँ और रहा नकारात्मकता की बात तो यह जब तक दुनिया हैं तब तक रहेगी और मैं इसको सामने लाकर, किसी न किसी रूप में इसका विरोध करूँगा. मैं कोई व्यक्ति नहीं और न ही कोई चेहरा हूँ......मैं एक विचार हूँ जो लाखों लोगो के पास हैं और वह अब इस समाज में फैली बुराई के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने ही वाला हैं.......आशा करता हूँ कि आप युहीं मेरे रास्ते में मुश्किलें पैदा करते रहेंगे और मैं उसका समाधान निकालता रहूँगा ....क्योंकि आप भी एक विचार हो जिसको आप जबरजस्ती अपना चेहरा देना चाहते हो.......हम चाहकर भी अलग नहीं हो सकते. हमें साथ ही रहना है कभी रावन बनकर तो कभी राम बनकर पर कभी भी हमारा कोई एक चेहरा नहीं हो सकता. यह सिर्फ हम पर निर्भर है कि हमें राम को दबाना है या रावन को .......पर ख़त्म तो इनमे से कोई नहीं हो सकता ...यदि हम इनमे से किसी एक को ख़त्म करने का ख्वाब देख रहे है तो यह हमारी ग़लतफ़हमी है........और गलत फहमी ही बुराई की जन्म देती है..........मानवता जिन्दावाद.................................!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

श्री पाठक जी, मै तों कुछ कहना नहीं चाहता था. क्योकि आप ने अपना विचार प्रकट किया है. जिसकी जैसी सोच होती है, वैसे ही वाक्य बनते है. किन्तु मै एक शंका में हूँ. आप ने एकाध लेखो पर अपनी टिप्पड़ी अंग्रेजी में क़ी है तों उससे उस लेख क़ी महिमा बड़ी है. किन्तु मैंने एक लेख पर टिप्पड़ी अंग्रेजी में कर दी तों आप बिदक गये. क्या अंग्रेजी में टिप्पड़ी करने का आप ने "कापी राईट " करा लिया है? दूसरी बात यह है कि आप ने उदाहरण भी दिया तों कुत्ते का दिया. अरे ब्राह्मण देवता ! कम से कम मिसाल तों ढंग का दे दिये होते. वैसे इस लेख के विषय से मै आप से शत प्रतिशत सहमत हूँ. और स्पष्ट कर दूँ कि प्रतिक्रियाएं तों मिलेगीं किन्तु वाह वाही के रूप में नहीं बल्कि ----------------------. पण्डित आर. के. राय प्रयाग

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

आदरणीय  प्रकाश जी, निवेदन है कि हमें इन  नकारात्मक  सूक्ष्म त्रुटियों को देखने की क्या आवशकता है। यदि हम  अपने अंदर इस तरह की त्रुटियाँ खोजने लग  गये, तो निश्चित  मानिये  हमारा बहुमूल्य जीवन  इन्हें ही खोजने में वयतीत  हो जायगा। फिर ये तो दूसरे की ऐसी  त्रुटि है जिसे केवल  त्रुटिवश  ही त्रुटि माना जा सकता है। इस  तरह की त्रुटि खोजना अतर्क  की श्रेणी में आयगा।  जिसे आप त्रुटि समझ  रहे हैं, वह  मेरी दृष्टि में अत्रुटि है। आपसे निवेदन है कि सकारात्क सोच  के  साथ   लिखे, दूसरे की त्रुटि को न खोज  कर समाज   में जो विषंगतियाँ, विषमतायें, अंधविश्वास  एवं कुरीतियाँ हैं, उनपर लिखें। मैं भी आपको आभार एवं धन्यवाद  बोल  देता हूँ, शायद आप इससे नाराज  नहीं होंगे।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

शुभ प्रभात! जी, इसमें कष्ट की क्या बात हैं? इन दोनों शब्दों के मायने परिशिती के अनुसार अलग--अलग होते हैं. फिलहाल मैं इनके द्वारा रखे गए इन शब्दों का अर्थ इनके परिपेक्ष में बताना चाहूँगा जिसके लिए वो लिखे हैं. "स्वागत" कहकर इन्होने सम्बंधित व्यक्ति का समर्थन किया है जो दर्शाता है कि सम्बंधित व्यक्ति के बातों में कोई नयी चीज पसंद आई होगी."धन्यवाद" इसलिए क्योंकि उनके विचारों को पढ़ने का मौका मिला. मैं आशा करता हूँ कि मैं काफी हदतक आपको सन्तुष कर पाया होऊंगा. आगे से मैं चाहूँगा कि आपके द्वारा और चुनौतिया मिलाती रहेगी. वैसे मैं कोई ज्ञानी नहीं बल्कि नंगा हूँ जो इस मंच पर नंगा नाच शुरू किया है देखना चाहेंगे आप . इ देखिये..... http://merisada.jagranjunction.com/2012/04/15/%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%A8-2/

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’




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